आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१४ आल्हखण्ड । ५७८ साथ न लेवे हम काहू को ठाकुर उदयसिंह सरदार १४१ - इतना कहिकै बेलारानी लश्कर कूच दीन करवाये ॥ बाजत डंका अह्तंकां के निर्भय चले शूरमाजाँय १४२ दिल्ली केरे फिरि डाँड़े मा लश्कर सबै पहुँचा आय ॥ गड़िगे तम्बू तहँ बेला के सवरँग ध्वजा रहे फहराय १४३ लिखीहकीकति फिरि पिरथीको कागज कलमदान मँगवाय ॥ बेला पहुँची अब मोहबे का औ घर जिया चँदेलाराय १४४ अधकर बाकी जो गौने की सो अब तुरत देउ पठवाय ॥ नहीं तो ब्रह्मान्हैं डाँड़े पर दिल्ली शहर देयँ फुँकवाय १४५ ताहर नाहर के हाथे सों अधकर तुरत देउ पहुँचाय ॥ कुशल आपनी जो तुम चाहौ मानो साँच पिथौराराय १४६ इतना लिखिकै बेलारानी धावन हाथ दीन पठवाय ॥ धावन चलिभा फिरि तम्बू ते औ दरबार पहुँचा आय १४७ लागि कचहरी पृथीराज की भारी लाग राज दरबार ॥ बैठक बैठे सब क्षत्री हैं टिहुनन घेरे नांगितलवार १४८ तहँ परवाना धावन दीन्ह्यो दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ खोलिकै चिट्ठी पिरथी पढ़िकै तुरतै गये सनाकाखाय १४६ उत्तर लिखिकै फिरि चिट्ठी का धावन तुरत दीन लौटाय ॥ ताहर बेटा को बुलवायो औसबहालकहासमुझाय १५० बेटी हमरी बैरिनि ह्वैगै ब्रह्माठाकुर दीन जियाय ॥ अधकर लेने को आये हैं सबियाँफौजलेउसजवाय १५१ जायकै पहुँँचो समरभूमि में अधकर तहाँ देउ चुकवाय ॥ मारे मारे तलवारिन के सबके देवो मूड़ गिराय १५२ अधकर तबहीं ई भरि पैहैं जैहैं भागि चँदेलेराय ॥