आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
१४ आल्हखण्ड । ५७८ साथ न लेवे हम काहू को ठाकुर उदयसिंह सरदार १४१ - इतना कहिकै बेलारानी लश्कर कूच दीन करवाये ॥ बाजत डंका अह्तंकां के निर्भय चले शूरमाजाँय १४२ दिल्ली केरे फिरि डाँड़े मा लश्कर सबै पहुँचा आय ॥ गड़िगे तम्बू तहँ बेला के सवरँग ध्वजा रहे फहराय १४३ लिखीहकीकति फिरि पिरथीको कागज कलमदान मँगवाय ॥ बेला पहुँची अब मोहबे का औ घर जिया चँदेलाराय १४४ अधकर बाकी जो गौने की सो अब तुरत देउ पठवाय ॥ नहीं तो ब्रह्मान्हैं डाँड़े पर दिल्ली शहर देयँ फुँकवाय १४५ ताहर नाहर के हाथे सों अधकर तुरत देउ पहुँचाय ॥ कुशल आपनी जो तुम चाहौ मानो साँच पिथौराराय १४६ इतना लिखिकै बेलारानी धावन हाथ दीन पठवाय ॥ धावन चलिभा फिरि तम्बू ते औ दरबार पहुँचा आय १४७ लागि कचहरी पृथीराज की भारी लाग राज दरबार ॥ बैठक बैठे सब क्षत्री हैं टिहुनन घेरे नांगितलवार १४८ तहँ परवाना धावन दीन्ह्यो दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ खोलिकै चिट्ठी पिरथी पढ़िकै तुरतै गये सनाकाखाय १४६ उत्तर लिखिकै फिरि चिट्ठी का धावन तुरत दीन लौटाय ॥ ताहर बेटा को बुलवायो औसबहालकहासमुझाय १५० बेटी हमरी बैरिनि ह्वैगै ब्रह्माठाकुर दीन जियाय ॥ अधकर लेने को आये हैं सबियाँफौजलेउसजवाय १५१ जायकै पहुँँचो समरभूमि में अधकर तहाँ देउ चुकवाय ॥ मारे मारे तलवारिन के सबके देवो मूड़ गिराय १५२ अधकर तबहीं ई भरि पैहैं जैहैं भागि चँदेलेराय ॥
[Header] बेलाताहरकामदान । ५७६ १५
इतना सुनिकै ताहर चलिभे दोऊहाथजोरिशिरनाय १५३ हुकुम लगायो फिरि लश्करमें तुरतै सजन लागि सरदार ॥ झीलमबखतर पहिरिसिपाहिन हाथम लई ढालतलवार १५४ सजे बछेड़ा ताजी तुर्की मुश्की घोड़ भये तय्यार ॥ लक्खा गर्रा पचकल्यानी सुर्खा सिर्गाआदि अपार १५५ डारि रकाबै गंगा यमुनी आननदीन लगाम लगाय ॥ हथी महाउत हाथी लैके तिनका दीन भूमि बैठाय १५६ धरी अँवारी तिन हाथिन पर बहुतन हौदा दीन धराय ॥ चुम्बक पत्थर के हौदा हैं जिनमेंसेलबलौंचाखाय १५७ कोउ कोउ हाथी इकइन्ता हैं कोउ दुइदन्त श्वेत गजराज ॥ यकमिलबैके सब चिंघरत हैं मानो कोपकीन सुरराज १५८ सजिगैं फौजैं दल बादल सों ताहर गये मातु के धाम ॥ हाल बतायो सब अगमा सों करिकैचलिभादण्डप्रणाम १५९ प्यारी अपनी के महलन में ताहर गये तड़ाका धाय ॥ बैठा ठाकुर जब शय्यापर दैया बिपति कही ना जाय १६० राह कटावै मंजारी तहँ होवै छींक तड़ातड़ आय ॥ झंझा वायू डोलन लागी आयूगईजनोनगच्याय १६१ बादल छायो आसमान में कउँधालपकिलपकिरहिजाय ॥ चमकै बिजुली त्यहि समया मा दमकै आसमान हहराय १६२ थर थर थर थर थर थर कंपै झंपै आसमान त्यहिकाल ॥ दर दर दर दर दर दर दरकै फरकैनहिनअंगत्यूहिकाल १६३ मरणहि सूचित भो पत्नी को ननँदी वचन गये ठहराय ॥ उठीतड़ाका लखि अशकुनको प्रीतम गरे गई लपटाय १६४ ताहर रोंक्यो त्यहि समया मा अपनी माया मोह भुजाय ॥
१६ आल्हखण्ड । ५८० हुकुम सुनावा महराजा का सत्रियाँ हाल कहा समुझाय १६५ लौटिकै मोर्चा ते आवब जब तुम्हरो करब मनोरथ आय ॥ ऐसे कहिकै ताहर नाहर चलिभे बहुत भांनिसमुझाय १६६ आये फ़ौजन में रण नाहर डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजत डंका अहर्तंका के लश्कर कूच दीन करवाय १६७ चढ़ि दलगंजन की पीठि मा मनगा श्रीगणेश पद ध्याय ॥ बन्दन कीन्ह्यो पितु चरणन का चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय १६८ प्राण निछावरि फिरि मनते करि चलिभा दिल्ली राजकुमार ॥ गर्जत तर्जत लर्जत आवत नाहर दिल्ली का सरदार १६६ आयकै पहुँचा समर भूमि मा गरुई हाँक कहा ललकार ॥ लेय चँदेला अब अधकर को आयो दिल्ली राजकुमार १७० सुनिकै बातें ये ताहर की बेला मोहवे का सरदार ॥ असल जनाना मर्दाना जो ठाना समर आय त्यहिवार १७१ पहिले मारुइ भइँ तोपन की पाछे चलन लागि तलवार ॥ सब हथियारन में तलवारी याही धर्मरूप अवतार १७२ आरयसाही जे उत्साही गाही धर्म युद्ध के यार ॥ तौन सिपाही बेपरवाही छाँड़े प्राण आशा त्यहिवार १७३ तड़ तड़ तड़ तड़ तड़ तड़काटैँ पाटैँ मुण्डन भूमि अपार ॥ मुरि २ गिरि २ लरि २ कितन्यो जूझन लागि शूरसरदार १७४ झम् झम् झम् झम् भाला वरसैँ तरसैँ घाव देखि जिययार ॥ भम् भम् भम् भम् क्षत्री भमकैँ चमकैँ चमाचम्मतलवार १७५ गम् गम् गम् गम् ढोलक गमकैँ दमकैँ शक्ति शूल विकराल ॥ मारु मारु कै मौहरि बाजै बाजै हाव हाव करनाल १७६ जूझे क्षत्री दुहुँ तरफ़ा के नदिया बही रक्त की धार ॥
बेलाताहरकामैदान । ५८१ १७ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डनके लगे पहार १७७ को गति बरणै वहि समया कै चहुँदिशि होय भड़ाभड़मार ॥ बड़ा लड़ैया ताहर नाहर यहुदल गंजनपर असवार १७८ मारत मारत रजपूतन को बेला पास पहूँचा आय ॥ जानि चँदेला फिरि ललकार्यो ठाकुर कूच जाउ करवाय १७९ ब्रह्मरूप तब बेला बोली नाहर साँचदेयँ बतलाय ॥ मोहिं झमेलाते मतलबना अधकर यहाँ देउ पहुँचाय १८० मोहिं जियावा घर बेलाने याही हेतु दीन पठवाय ॥ भिक्षुक हैकै समरभूमि में चाहै आप लेयँ छुड़वाय १८१ ऐसे अधकर यहु छुटि है ना दुइमा एक बंश रहिजाय ॥ इतना सुनिकै ताहर नाहर बोले दोऊ भुजा उठाय १८२ सँभरिकै बैठे अब घोड़े पर ठाकुर खबरदार है जाय ॥ इतना कहिकै ताहर नाहर भालामारा तुरत चलाय १८३ वार बचाई तहँ भाला की बेला खैंचिलीन तलवार ॥ ऐंचि सिरोही बेला मारी ताहर लीन ढालपर वार १८४ यहु इकवन्ता को चढ़वैया चौंड़ा आयगयो त्यहिबार ॥ रूप देखिकै सो बेला का जान्यो सबै कपटव्यवहार १८५ चुरिया खुलिगै इक बेला की सोऊ दृष्टि परी त्यहिबार ॥ चौंड़ा बोला तब ताहर ते यहुनहिंमोहबेकासरदार १८६ बहिनि तुम्हारी यह बेला है तुमते साँच बतावैं यार ॥ इतना सुनिकै ताहर ठाकुर चकितलखनलागत्यहिवार १८७ गाफिल देख्यो जब ताहरको बेला हनी तुरत तलवार ॥ घायल हैगा ताहर ठाकुर बेलाकाटिलीन शिरयार १८८ बड़ा झमेला अब को गावै बेला कूच दीन करवाय ॥
१८ आल्हखण्ड । ५८३ बाजत डंका अहंतंका के तम्बुन फेरि पहुँचौ आय १८६ लश्कर पहुँच्यो सब दिल्लीमा घर घर खबर गई यह छाय ॥ बेला मारा है ताहर को कोऊ रँधा भात ना खाय १६० रानी अगमा के महलन मा - पहुँची खबरि तड़ाका आय ॥ को गति वर्णै त्यहि समयकै विपदा गई महलमें छाय १६१ विचरै रानी रनिवास मा गिरि गिरि परै पछाराखाय ॥ रूप शील गुण वर्णन करिकै मनमा बारबार पछिताय १६२ नाहक बेला तू पैदा भइ डारे बंश नाश करवाय ॥ त्वरे वियाहेते गौने लौं जूझे सातपुत्र रणजाय १६३ दियाबैया अब महलन में कोऊ नहीं परै दिखलाय ॥ सातपुत्र की मैं महतारी सो निरवंश डरे करवाय १६४ कैसि निर्दयी बेला ह्वैगै मारेसि समर आपनो भाय ॥ इतना कहिकै रानी अगमा फिरिगिरिगई मूर्च्छाखाय १६५ छाय उदासी गै दिल्ली मा कहूँ नहिं मसातलक झन्नाय ॥ घर घर रय्यत अपने रोवै दर दर गाथ गई यहछाय १६६ बदला लीन्ह्यो चंदेले का बेला समरभूमि में आय ॥ यहि अलबेला अब गाथा को पूरणकीन यहाँते भाय १६७ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ चरि चरि गौवैं घरका डगर्सिं पक्षी चले बसेरन धाय १६८ गिरे आलसी खटिया तकितकि सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देऊँ मुन्शी सुत जीवो प्रागनरायणभाय १६६ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहें चन्द औ सूर ॥ पालिक ललितेके तबलौं तुम यशसों रहो सदा भरपूर २०० माथ नवावौं पितु माता को जिन बल पूरिभई यह गाय ॥
बेलाताहरकामैदान । ५८३ १६ विपति निवारण जगतारण के दूनों धरों चरणपर माथ २०१ करों तरंग यहाँसों पूरण तवपद सुमिरि भवानीकन्त ॥ रामरमामिलि दर्शन देवो इच्छा यहीमोरि भगवन्त २०२ इति श्रीलखनऊनवासि ( सी, आई, ई ) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलां निवासिमिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनुपण्डितललिताप्रसाद कृत ताहरबधवर्णनोनामप्रथमस्तरङ्गः ॥ १ ॥ बेलाताहरकामैदानसमाप्त ॥ इति ॥
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॥ श्री गणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ चन्दनबगियाका युद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ ता पद पङ्कज प्रेम नितै सो इतै हम चाहत शारदरानी । ध्यावत तोहिं मनावत गावत पावत मोद महेश भवानी ॥ हे सुखदे वसुदे यशुदे तब भाग कहौं तौ कहाँलों बखानी । गावत गीत यही ललिते फलिते पदपङ्कज जे रतिमानी १ सुमिरन ॥ मैं पद बन्दों जगदम्बा के अम्बाचरण कमल धरि माथ ॥ करि अवलम्बा श्रीदुर्गा का गावा चहौं यहाँ कछु गाथ १ मोहिं भरोसा महरानी का दानी तीनिलोककी माय ॥ सब सुखखानी दुर्गा रानी पूरण कृपा करो अब आय २ जनकनन्दिनी के पद बन्दों जिन बल चला जाउँ भवपार ॥ नैया डगमग डगमग होवै बूडन चहै सदा मँझधार ३ नहीं खेवैया कोउ नैया को मैया तुम्हीं लगावै पार ॥
आल्हाखण्ड । ५८६ दैया दैया करि मरि जावै ज्यहिनहिंचरणकमलआधार४ छूटि सुमिनी गै देवी कै शाक्ता सुनो शूरमन क्यार ॥ चन्दन वगिया को कटवाई ठाकुर उदयसिंह सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ ब्रह्मा ठाकुर त्यहि समया मा साँचो मरणहार दिखलाय ॥ गाँसी खटकति है मस्तक में कोखिन सेल्ल कटारी घाय १ बेला रानी त्यहि समया मा लै शिर तहाँ पहुँची जाय ॥ जहाँ चँदेला सुख शय्या मा करहत रहै बाण के घाय २ धरि शिर दीनह्यो तहँ ताहर को बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥ कीनि आज्ञा पूरण स्वामी मारा समर आपनो भाय ३ सुनिकै बातैं ये बेला की देखन लाग चँदेलाराय ॥ जब शिर दीख्यो सो ताहरका तब मनमोद भयो अधिकाय ४ ब्रह्मा बोले फिरि बेला ते प्यारी साँच देयँ बतलाय ॥ मैके ससुरे सब सुख तुम्हरे चाहौ रहौ तहाँ तुम जाय ५ नहीं भरोसा अब जीवनका प्यारी प्राणरहे नगच्याय ॥ इतना कहिकै ब्रह्मा ठाकुर सुरपुर गयो तड़ाकाधाय ६ बेला गिरिकै रोवन लागी कारण करनलागि अधिकाय ॥ जो मैं जनतिउँ यह गति होई काहे हनति समर में भाय ७ हाय ! विधाताकी मर्जी यह हमरे बूत सही ना जाय ॥ चटक चूनरी ना मैली भै ना हम धरा सेज पै पाँय ८ खबरि पहुँकिगै यह महलन में रानी गिरीं भरहरा खाय ॥ हाहाकार परा मोहबे मा कोऊ रँधा भात ना खाय ६ ऊदन लाखनि दोऊ आये जहँपर मरा चँदेलाराय ॥ ने समुझायै भल बेलाको रानी शोक देउ विसराय १०
चन्दनबागकेरमेदान । ५८७ ३ पारस पत्थरहै मोहबेमा लोहा छुवत सोन हैजाय ॥ राजपाट लै सब मोहबेकै तुमसुखभोगकरोअधिकाय ११ इतना सुनिकै बेला बोली मानो साँच बनाफरराय॥ जल्दी जावो तुम दिल्लीको चन्दनबाग कटावो जाय १२ बिना पियोरे इक प्रीतम के सबसुखनरकसरिस दिखराय ॥ नाशकरनको हम उपजीर्थी दूनों बंश डरे मरवाय १३ अब सुखसोवैं कस मोहबेमा दिल्ली जाउ बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले बेला साँचदेयँ बतलाय१४ अब नहिं जावैं हम दिल्लीको कीन्हे कोप पिथौराराय ॥ जान आपनो सबको प्यारो जलथल जीवजन्तुजेमाय १५ पगिया अरझी नहिं बगिया में सोई चन्दनदेयँ मँगाय ॥ औरो चन्दन बहु दुनिया में सोकहुछकरनलवों लदाय १६ पै अब दिल्ली को जैहौं ना बेला साँच देउँ बतलाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली मानो कही बनाफरराय १७ शाप तड़ाका अब मैं देहौं ऊदन तुरत भस्म हैजाय ॥ बातें सुनिकै ये बेला की कम्पितभयो लखुरवाभाय १८ लाखनि बोले तब ऊदन ते चंदन चलो देयँ कटवाय ॥ आखिर देही यह रहिहै ना अब यश लेउ बनाफरराय १९ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कहौ कनौजीराय ॥ जल्दी चलिये अब दिल्लीको चन्दनबाग लेयँ कटवाय २० सम्मत करिकै ऊदन लाखनि डंका तुरत दीन बजवाय ॥ बाजे डंका अहर्तका के हाहाकार शब्दगा छाय २१ भूरी सजिकै लखराना की तुरतै गई तड़ाका आय ॥ फूलमती पद वन्दन करिकै त्यहिपर बैठ कनौजीराय २२
४ आल्हाखण्ड । ५८८ ऊदन बैठे रस बेंदुलपर मन में ध्याय शारदामाय ॥ सजे सिपाही सब ठाढ़े थे तुरतै कूच दीन करवाय २३ बाजत डंका अहतंका के यमुना पास पहुँचे जाय ॥ पार उतरिकै श्री यमुना के दिल्लीशहर गये नगच्याय २४ चन्दन बगिया जहँ पिरथीकी तहँ पर गये बनाफरराय ॥ चन्दन बढ़ई को बुलवायो चन्दन सबै दीन गिरवाय २५ तब तो माली हल्ला करिकै चलिभे जहां पिथौराराय ॥ लगी कचहरी महराजा की शोभा कही बून ना जाय २६ ठाढ़े माली तहँ बिनवत हैं दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ ऊदन आये हैं मोहवे ते चन्दनबाग डरी कटवाय २७ कहा न माना क्यहु मालीका ओ महराज पिथौराराय ॥ सुनिकै बातें ये माली की चौंड़ा धाँधू लीन बुलाय २८ कहि समुझावा तिन दूननते यहु महराज पिथौराराय ॥ जितने आये हैं बगिया में सबकी कटा देउ करवाय २६ इतना सुनिकै चौंड़ा धाँधू दूनों लीन फौज सजवाय ॥ चढ़ि इकवन्ता भौंरानँदपर दूनों कूच दीन करवाय ३० भारीलश्कर इत लाखनि का उत यहु गयो चौंड़ियाआय ॥ चन्दन छकड़ा चौंड़ा घेरे औ यह बोला भुजा उठाय ३१ कौन बहादुर है मोहवे मा चन्दनबाग लीन कटवाय ॥ हुकुम पिथौरा का नाहीं है लकड़ी एक यहाँ से जाय ३२ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की सम्मुख गये बनाफरराय ॥ हमीं बहादुर हैं मोहवे के चन्दनबाग लीन कटवाय ३३ मोहिं ठकुरानी बेला रानी मोहवे वाली दीन पठाय ॥ सच्ची ह्वैहै लै ब्रह्मा को चौंड़ा साँच दीन बतलाय ३४
चन्दनबागकेरमैदान। ५८६ ५ दुनिया जानति है ऊदन को जिनके लड़न क्यार बयपार ॥ दूसर धंधा कछु कीन्हे ना चौड़ा मानु कही यहि बार ३५ अटक पारलौं झंडा गड़िगा बाजी सेतबन्धलौं टाप ॥ दतिया बूंदी जालंधर औ हमरी भई कमायूँ थाप ३६ चन्दन जैहैं सब मोहबे को चाहे फौज देउ कटवाय ॥ रुकिहै चन्दन अब चौड़ाना तुमते साँच दीन बतलाय ३७ इतना सुनिकै जरा चौंड़िया तुरतै लीन्ह्यो गुर्ज उठाय ॥ ऐंचि कै मारा सो ऊदन के लैगा बेंदुल वार बचाय ३८ बचा डुलरूवा द्यावलिवाला हौदा ऊपर पहुँचाजाय ॥ कलश सूवरण हौदावाले सो धरती मा दीन गिराय ३६ झुके सिपाही दुहुँतरफा के लागी चलन तहाँ तलवार ॥ पैग पैग पै पैदल गिरिगे दुइ दुइ पैग गिरे असवार ४० मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ॥ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ४१ बिजयसिंह है बिकानेर को बिरसिंह गाँजर को सरदार ॥ दोऊ मारैं दोउ ललकारैं दोऊ समरधनी तलवार ४२ कोऊ हारै नहिं काहू सों दोउ रण परा बरोबरि आय ॥ दोऊ ठाकुर हैं हाथी पर दोऊ देयँ सेलके घाय ४३ वार चूकिगे बिरसिंह ठाकुर मारा विजयसिंह सरदार ॥ जूझिगे बिरसिंह समरभूमि में हिरसिंह आयगयोत्यहिबार ४४ सँभरो ठाकुर अब हौदापर कीन्ह्यो विजयसिंह ललकार ॥ सुनिकै बातें विजयसिंह की हिरसिंह खैंचिली नितलवार ४५ ऐंचिकै मारा विजयसिंह को सो तिन लीन ढालपर वार ॥ रिसहा ठाकुर बिकानेर को सोत्यहि मारा फेरि कटार ४६
६ आल्हखण्ड । ५६० लागि कटारी गै हिरसिंह के सोऊ जूझिगयो त्यहिवार ॥ हिरसिंह विरसिंह गाँजरवाले दोऊ जूझिगये सरदार ४७ तब महराजा कनउज वाला लाखनिराना कहा पुकार ॥ गंगा मामा कुड़हरिवाले मारो विजयसिंह यहिवार ४८ इतना सुनिकै गंगाठाकुर अपनो हाथी दीन बढ़ाय ॥ विजयसिंह को फिरिललकारा ठाकुर कूच जाउ करवाय ४९ नहीं तो बचिहौ ना हौदापर जो विधि आपु बचावै आय ॥ इतना सुनिकै विजयसिंह ने अपनो हाथी दीन बढ़ाय ५० विजयसिंह औ फिरि गंगाका परिगा समर बरोबरि आय ॥ सेल चलाई विजयसिंह ने गंगा लैगे वार बचाय ५१ ऐंचिकै भाला गंगा मारा त्यहिके गई प्राणपर आय ॥ जूझिग राजा विकानेर का गंगा बढ़ा तड़ाका धाय ५२ हीरामणि चरखारी वाला सोऊ गयो तहॉपर आय ॥ त्यहिललकारा फिरि गंगाको ठाकुर खबरदार ह्वैजाय ५३ वार हमारी ते बचिहै ना जो विधि आपु बचावै आय ॥ त्यहिते तुमका समुझाइत है ठाकुर कूच जाउ करवाय ५४ इतना कहिकै हीरामणि ने मारी खैंचि तुरत तलवार ॥ बचिगा ठाकुर कुड़हरि वाला लीन्हेसिआड़ि ढालपरवार ५५ बोला ठाकुर चरखारी का ठाकुर धन्य तोर अवतार ॥ मैं हनि मारा दुहुँ हाथ ते पै तुम लीन ढालपर वार ५६ सुनिकै बातें हीरामणि की गंगा लीन तुरत तलवार ॥ ऐंचिकै मारा हीरामणि के सो पै जूझिगयोत्यहिवार ५७ स्याबासि स्याबासि गंगा मामा लाखनि कहा बचन् ललकार ॥ तुम्हारी समता का क्षत्री ना अब कोउ देखिपरे यहिवार ५८
चन्दनबागकेरमैदान। ५६१ ७ करि खलभल्ला औ हल्लाअति लल्ला देशराजका लाल॥ लड़ै इकल्ला रजपूतन ते कल्ला काटि गिरावै हाल ५६ जैसे होरी बल्ला जावै तैसे चलै खूब तलवार॥ करै दुपल्ला तहँ छातिन के नाहर उदयसिंह सरदार ६० जैसे भेड़िन भेड़हा पैठै जैसे अहिर बिडारै गाय॥ तैसे रणमा चौंड़ा मारै क्षत्रीजायँ युद्ध अलगाय ६१ चौंड़ा ऊदनकी मारुनमा द्वउदल भिन्न भिन्न हैजायाँ॥ यहु रण नाहर चौंड़ा बाँभनु बहु रणबाछु बनाफरराय ६२ कोऊ काहूते कमती ना द्वउरण परा बरोबरि आय॥ लाखनि धाँधूका मुर्च्चाभा शोभा कही बूत ना जाय ६३ लड़ै सिपाही दुहुँ तरफा ते आमाझोर चलै तलवार॥ ना मुहँ फेरैं दिल्लीवाले ना ई मोहबे के सरदार ६४ बड़ी लड़ाई भै बगियां में चौंड़ा ऊदन के मैदान॥ कायर भागे दुहुँ तरफा ते अपने अपने लिये परान ६५ लश्कर भाग्यो पृथीराज का जीत्यो कनउजका सरदार॥ लादिकै छकरनमें चन्दन को चलिभाउदयसिंहतहिव्हार ६६ बाजत डंका अहर्तंका के लाखनि कूचदीन करवाय॥ पार उतरि कै श्री यमुना के तम्बुन फेरि पहुँचे आय ६७ लाखनि ऊदन दोऊ ठाकुर बेलै खबरि जनाई जाय॥ यह अलबेला बेला रानी अनमन उठी तहाँ ते धाय ६८ दीख्यो छकरा फिरि चन्दनका बोली सुनो बनाफरराय॥ गीले चन्दन ते सरि है ना सूखो चन्दन देउ मँगाय ६६ बारह खम्भा हैं दिल्ली मा जहाँ दरबार पिथौरा क्यार॥ ते लै आवो तुम जल्दी अब ठाकुर उदयसिंह सरदार ७०
[Header] ८ आल्हखण्ड । ५६२
सुनिकै बातें ये बेला की बोला फेरि बनाफरराय ॥ सूखो चन्दन हम कनउज ते स्वामिनि आजु देयँ मँगवाय ७१ पै नहिं जावैं अब दिल्ली को तुम ते साँच देयँ बतलाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली साँची कहौ बनाफरराय ७२ मंशा तुम्हारी पूरण ह्वैगै जूझै समर चँदेलेराय ॥ हम पर मोहे तुम ऊदन थे ताते डारे कन्त मराय ७३ चहौ एकन्त भोग जो करनो सोहै कठिन बनाफरराय ॥ परपति भोगै अब बेला ना चहुतनधज्जीधज्जीउड़िजाय ७४ भल चतुराई तुम सीखी थी कीन्ही खूब समय पर भाय ॥ पूर मनोरथ तब होई ना मानो साँच बनाफरराय ७५ राज पाट अरु तनु धनकारण हम नहिं सकैं धर्मको टारि ॥ सतयुग त्रेता अरु द्वापरके करिबे धर्म यहां अनुहारि ७६ चन्दनखम्भा की तुम लावौ की अब लेउ शाप विकराल ॥ झूठ न यामें कछु जानो तुम बेटा देशराजके लाल ७७ इतना सुनिकै डरे बनाफर तब फिरि कहा कनौजीराय ॥ ह्वै तुम बेटी महराजा की काछी बात रहिउ बतलाय ७८ ऐस बनाफर नहिं ऊदनहैं जो रण डारै कन्त मराय ॥ मौत आयगै चन्देले कै उनकै बुद्धिगयी बौराय ७६ भरी कचहरी परिमालिक की बीरा लीन्ह्यनि हाथउँड़ाय ॥ बीरालेती जो ब्रह्मा ना ऊदन बिदा लेतिकरवाय ८० बढ़िहा राजा परिमालिकहैं घटिहा बंश बीर चौहान ॥ घाटि न करतीं जो ब्रह्माते जीतत कौन समरमैदान ८१ चंदन जितनो तुम बतलावौ तितनो देयँ आज मँगवाय ॥ पगिया अरझी नहिं दिल्ली में अनहक प्राण गँवावैं जायँ ८२
चन्दनबागकेरेमैदान । ५६३ ह इतना सुनिकै बेला बोली मानो साँच कनौजीराय ॥ प्राणपियारे जो तुम्हरे हैं तौ तुम कूचदेउ करवाय ८३ तेहा राखौ रजपूती का चन्दनखम्भ देउ मँगवाय ॥ नहीं जनाना बनि मोहबे, ते जावो लौटि कनौजीराय ८४ शाप मैं देहौं अब ऊदन का तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ मोहबा दिल्ली दुउ शहरनमें परिहैं राँड़ राँड़ दिखलाय ८५ इतना सुनिकै लाखनि बोले बेला साँच देयँ बतलाय ॥ बहुत झमेला ते मतलब ना चन्दन देब वही मँगवाय ८६ तौ तौ लड़का रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरो मुड़वाय ॥ सुनि कै बातें लखराना की बेला बड़ी खुशी है जाय ८७ तबै बनाफर उदयसिंहजी तहँते कूच दीन करवाय ॥ फिरि यह बोले लखराना ते मानो कही कनौजीराय ८८ मृत्यु रूप यह बेला रानी दीन्ह्यसि बोलि दुऊकुलभाय ॥ नाश करनके हित यह बेला चन्दनखम्भ रही मँगवाय ८६ नहीं तो मतलब का खम्भाते जब हम और देयँ मँगवाय ॥ अपन रँड़ापा ते चाहति है सब संसार राँड़ द्वै जाय ६० प्राण आपने हम मल्हना को दीन्हे व्याह नेगमें भाय ॥ सो अब विरिया चलिआई है बेला मृत्यु बहाना आय ६१ कयहू समुझाये ते समुझै ना बेला विपति बोलि हरियाय ॥ जियत पिथौरा के द्वैहैं ना की हम खम्भलेयँ उखराय ६२ दुखित पिथौरा अब दुनियामा मरिगे सात पूत रणआय ॥ पुत्र न एको अब पृथ्वी के जो अवलम्बपरै दिखलाय ६३ बिना पुत्रके गति नहिं होवे वेद औ शास्त्र रहे बतलाय ॥ अगमा मल्हना दुउ रानिनकी बेला नाशिदीन करवाय ६४ ३८
१० आल्हखण्ड । ५६४ ह्वै झमेला हमपर तुमपर कैसी करैं कनौजीराय ॥ ऐसी सुनिकै लाखनि बोले मानो साँच बनाफरराय ६५ होनी ह्वैहै सो ह्वैहै अब याही ठीक लेउ ठहराय ॥ मृत्यु आयगै जब रावणकै तब वनवासगये रघुराय ६६ कोऊ रक्षा तब कीन्ह्यो ना जब मुनिपिया समुन्दरजाय ॥ ब्रह्मा विष्णू शिव सम्बन्धी इनसेऔर कौन अधिकाय ६७ बिपति समुन्दर पर जब आई तब सबगये तुरत अलगाय ॥ त्यहिते सम्मत अब याही है भुरहीं कूच देउ करवाय ६८ मर्जी होई नारायण की होई स्वई बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कहौ कनौजीराय ६६ सम्मत ठीकौ अब याही है दिल्ली चलैं तड़ाकाधाय ॥ मर्जी याही नारायण की अनरथरूप परै दिखलाय १०० इतना कहिकै लाखनि ऊदन सोये द्वऊ सेजपर जाय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों भंडागड़ानिशाकोआय १०१ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भांय १०२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौं तुम यश सों रहौ सदा भरपूर १०३ पूरण कीन्ह्यो अब याहींते चन्दन बाग केरि सबगाथ ॥ वन्दन करिकै पितु माताके दूनों धरौं चरणपर माथ १०४ पूरि तरंग यहाँ सों द्वैगै तब पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही मोरि भगवन्त १०५ इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारा- यणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुधकृपा- शंकरसूनुपं०ललिताप्रसादकृतचंदनवाटिका युद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥
॥ श्रीगणेशाय नमः ॥ अथ आल्हखण्ड ॥ चन्दनखम्भाकायुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ सोहत मुण्डनमाल हिये अरु भाल में चन्द्र बिराजत नीके । शूल औ शक्ति कृपाण लिये डमरू कर सोहत शम्भुबलीके ॥ खातहैं भंग धरे शिरगंग सो नंग फिरैं अरधंग सतीके । जंग जुरे न टरैं ललिते हम ध्यावत चर्ण हैं शम्भु यतीके १ सुमिरन ॥ विपत्ति विदारण जगतारण के दूनों धरौं चरणपर माथ ॥ पूर मनोरथ तुम्हहीं करिहौ स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ १ वल्कल धारे जटा सँवारे मारे बली बीर दशमाथ ॥ सो हैं स्वामी अवधपुरी के लीन्हे धनुषत्राण प्रभु हाथ २ अक्षत चन्दन औ पुष्पन सों मानस पूजन परम उदार ॥ सो मैं करिकै रघुनन्दन का जावा चहौं जगत के पार ३ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धहौ स्वामी र... ... ... ॥
२ आल्हखण्ड । ५६६ कीरति देवो नित दुनिया में राखो मोरि जगत में लाज ४ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ चन्दनखम्भा ऊदने लैहैं होई महाभयङ्कर मार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरब मा किरणन कीन जगतउजियारा॥ सोय के जागे उदयसिंह जब लागे करन फौज तय्यार १ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरी अँवारी तिन हाथिनपर बहुतक हौदा रहे विराज २ इक इक हाथी के हौदामा दुइ दुइ भये वीर असवार ॥ सजा रिसाला घोड़नवाला आला साठि सहस त्यहिबार ३ झीलमबखतरपहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥ चढ़े कनौजी तब भूरी पर ऊदन बेंदुल भे असवार ४ देवा सय्यद बनरसवाले औ जगनायक भये तयार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ५ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग व्यवहार ॥ पहिल नगाड़ा में जिन बन्दी दुसरे फाँदि भये असवार ६ तिसर नगाड़ा के बाजत खन लाखनि कूचदीन करवाय ॥ पार उतरिकै श्रीयमुना के दिल्ली शहर गये नगच्याय ७ तीनि अनी करि तहँ सेनाकी खम्भा तुरत लीन उखराय ॥ बारहु खम्भा चन्दनवाले छकरन उपर लीन लदवाय ८ भा खलभल्ला औ हल्ला अति पायो खबरि पिथौराराय ॥ धावा कीन्ह्यो उदयसिंहने चन्दन खम्भ लीन उखराय ६ सुना पिथौरा जब वातैं ई दीन्ह्यो वीरभुगन्त पठाय ॥ १०
चन्दनखम्भाकामंदान । ५६७ ३ भा खलभल्ला औ हल्ला तब लोगन दीन्ह्यो लागलगाय ॥ मुर्चाबन्दी दुहुँ तरफा ते दूनों तरफ बीर समुहाय ११ मारन लागे तलवारी सों दूनों तरफ बरोबरि आय ॥ अपने अपने सब मुर्चनमा ज्वाननदीन्हे ज्वान गिराय १२ औ ललकारैं फिरि फिरि मारैं अद्भुत समर कहा ना जाय ॥ लिहे जँजीरें हाथी मारैं घोड़ा मारैं टाप चलाय १३ दाँतन काटैं फिरि फिरि डाटैं चाटैं रक्त भूत बैताल ॥ मारि लहाशन के भुइँ पाटैं ल्वाटैं समरशूर त्यहिकाल १४ ह्वातैं लागीं तहँ श्वानन की ज्वानन खूब कीन तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १५ मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ खट खट खट खट तेगा बोलै ऊना चलै बिलाइतिक्यार १६ भाला बरछी तीर तमंचा कहुँ कहुँ कड़ाबीनकी मार ॥ छुरी कटारी कउ कउ मारैं कउ कउ बीर रहे ललकार १७ कउ मुखफारैं नखन बिदारैं डारैं चीरि फारि मैदान ॥ कोऊ हारै नहिं काहू सों ज्वाननकीन घोर घमसान १८ परशूठाकुर लाखनि दिशि को अंगद नृपतिग्वालियरक्यार ॥ मुर्चाबन्दी भै दूनन कै दूनों लड़न लागि सरदार १६ अंगद मारै तलवारी सों परशू लेय ढालपर वार ॥ परशू मारै तलवारी सों अंगद रोकि लेय त्यहिवार २० बड़ी लड़ाई भै दूननमा दूनन खूब कीन तलवार ॥ वार चूकिगे अंगद राजा परशू मारिदीन त्यहि वार २१ गिरिगा राजा ग्वालियर का आयो बीर भुगन्ता ज्वान ॥ बीर भुगन्ता के मुर्चा मा परशू खूब कीन मैदान २२