आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें२ आल्हखण्ड । ५६६ कीरति देवो नित दुनिया में राखो मोरि जगत में लाज ४ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाका सुनो शूरमन क्यार ॥ चन्दनखम्भा ऊदने लैहैं होई महाभयङ्कर मार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ उदय दिवाकर भे पूरब मा किरणन कीन जगतउजियारा॥ सोय के जागे उदयसिंह जब लागे करन फौज तय्यार १ अंगद पंगद मकुना भौंरा सजिगे श्वेतवरण गजराज ॥ धरी अँवारी तिन हाथिनपर बहुतक हौदा रहे विराज २ इक इक हाथी के हौदामा दुइ दुइ भये वीर असवार ॥ सजा रिसाला घोड़नवाला आला साठि सहस त्यहिबार ३ झीलमबखतरपहिरिसिपाहिन हाथम लई ढाल तलवार ॥ चढ़े कनौजी तब भूरी पर ऊदन बेंदुल भे असवार ४ देवा सय्यद बनरसवाले औ जगनायक भये तयार ॥ ढाढ़ी करखा बोलन लागे विप्रन कीन वेद उच्चार ५ रणकी मौहरि बाजन लागी रणका होनलाग व्यवहार ॥ पहिल नगाड़ा में जिन बन्दी दुसरे फाँदि भये असवार ६ तिसर नगाड़ा के बाजत खन लाखनि कूचदीन करवाय ॥ पार उतरिकै श्रीयमुना के दिल्ली शहर गये नगच्याय ७ तीनि अनी करि तहँ सेनाकी खम्भा तुरत लीन उखराय ॥ बारहु खम्भा चन्दनवाले छकरन उपर लीन लदवाय ८ भा खलभल्ला औ हल्ला अति पायो खबरि पिथौराराय ॥ धावा कीन्ह्यो उदयसिंहने चन्दन खम्भ लीन उखराय ६ सुना पिथौरा जब वातैं ई दीन्ह्यो वीरभुगन्त पठाय ॥ १०