आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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सुनिकै बातें ये बेला की बोला फेरि बनाफरराय ॥ सूखो चन्दन हम कनउज ते स्वामिनि आजु देयँ मँगवाय ७१ पै नहिं जावैं अब दिल्ली को तुम ते साँच देयँ बतलाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली साँची कहौ बनाफरराय ७२ मंशा तुम्हारी पूरण ह्वैगै जूझै समर चँदेलेराय ॥ हम पर मोहे तुम ऊदन थे ताते डारे कन्त मराय ७३ चहौ एकन्त भोग जो करनो सोहै कठिन बनाफरराय ॥ परपति भोगै अब बेला ना चहुतनधज्जीधज्जीउड़िजाय ७४ भल चतुराई तुम सीखी थी कीन्ही खूब समय पर भाय ॥ पूर मनोरथ तब होई ना मानो साँच बनाफरराय ७५ राज पाट अरु तनु धनकारण हम नहिं सकैं धर्मको टारि ॥ सतयुग त्रेता अरु द्वापरके करिबे धर्म यहां अनुहारि ७६ चन्दनखम्भा की तुम लावौ की अब लेउ शाप विकराल ॥ झूठ न यामें कछु जानो तुम बेटा देशराजके लाल ७७ इतना सुनिकै डरे बनाफर तब फिरि कहा कनौजीराय ॥ ह्वै तुम बेटी महराजा की काछी बात रहिउ बतलाय ७८ ऐस बनाफर नहिं ऊदनहैं जो रण डारै कन्त मराय ॥ मौत आयगै चन्देले कै उनकै बुद्धिगयी बौराय ७६ भरी कचहरी परिमालिक की बीरा लीन्ह्यनि हाथउँड़ाय ॥ बीरालेती जो ब्रह्मा ना ऊदन बिदा लेतिकरवाय ८० बढ़िहा राजा परिमालिकहैं घटिहा बंश बीर चौहान ॥ घाटि न करतीं जो ब्रह्माते जीतत कौन समरमैदान ८१ चंदन जितनो तुम बतलावौ तितनो देयँ आज मँगवाय ॥ पगिया अरझी नहिं दिल्ली में अनहक प्राण गँवावैं जायँ ८२