आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्दनबागकेरेमैदान । ५६३ ह इतना सुनिकै बेला बोली मानो साँच कनौजीराय ॥ प्राणपियारे जो तुम्हरे हैं तौ तुम कूचदेउ करवाय ८३ तेहा राखौ रजपूती का चन्दनखम्भ देउ मँगवाय ॥ नहीं जनाना बनि मोहबे, ते जावो लौटि कनौजीराय ८४ शाप मैं देहौं अब ऊदन का तुमते साँच देयँ बतलाय ॥ मोहबा दिल्ली दुउ शहरनमें परिहैं राँड़ राँड़ दिखलाय ८५ इतना सुनिकै लाखनि बोले बेला साँच देयँ बतलाय ॥ बहुत झमेला ते मतलब ना चन्दन देब वही मँगवाय ८६ तौ तौ लड़का रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरो मुड़वाय ॥ सुनि कै बातें लखराना की बेला बड़ी खुशी है जाय ८७ तबै बनाफर उदयसिंहजी तहँते कूच दीन करवाय ॥ फिरि यह बोले लखराना ते मानो कही कनौजीराय ८८ मृत्यु रूप यह बेला रानी दीन्ह्यसि बोलि दुऊकुलभाय ॥ नाश करनके हित यह बेला चन्दनखम्भ रही मँगवाय ८६ नहीं तो मतलब का खम्भाते जब हम और देयँ मँगवाय ॥ अपन रँड़ापा ते चाहति है सब संसार राँड़ द्वै जाय ६० प्राण आपने हम मल्हना को दीन्हे व्याह नेगमें भाय ॥ सो अब विरिया चलिआई है बेला मृत्यु बहाना आय ६१ कयहू समुझाये ते समुझै ना बेला विपति बोलि हरियाय ॥ जियत पिथौरा के द्वैहैं ना की हम खम्भलेयँ उखराय ६२ दुखित पिथौरा अब दुनियामा मरिगे सात पूत रणआय ॥ पुत्र न एको अब पृथ्वी के जो अवलम्बपरै दिखलाय ६३ बिना पुत्रके गति नहिं होवे वेद औ शास्त्र रहे बतलाय ॥ अगमा मल्हना दुउ रानिनकी बेला नाशिदीन करवाय ६४ ३८