भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 595

१० आल्हखण्ड । ५६४ ह्वै झमेला हमपर तुमपर कैसी करैं कनौजीराय ॥ ऐसी सुनिकै लाखनि बोले मानो साँच बनाफरराय ६५ होनी ह्वैहै सो ह्वैहै अब याही ठीक लेउ ठहराय ॥ मृत्यु आयगै जब रावणकै तब वनवासगये रघुराय ६६ कोऊ रक्षा तब कीन्ह्यो ना जब मुनिपिया समुन्दरजाय ॥ ब्रह्मा विष्णू शिव सम्बन्धी इनसेऔर कौन अधिकाय ६७ बिपति समुन्दर पर जब आई तब सबगये तुरत अलगाय ॥ त्यहिते सम्मत अब याही है भुरहीं कूच देउ करवाय ६८ मर्जी होई नारायण की होई स्वई बनाफरराय ॥ इतना सुनिकै ऊदन बोले साँची कहौ कनौजीराय ६६ सम्मत ठीकौ अब याही है दिल्ली चलैं तड़ाकाधाय ॥ मर्जी याही नारायण की अनरथरूप परै दिखलाय १०० इतना कहिकै लाखनि ऊदन सोये द्वऊ सेजपर जाय ॥ खेत छूटिगा दिननायक सों भंडागड़ानिशाकोआय १०१ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनरायण भांय १०२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौं तुम यश सों रहौ सदा भरपूर १०३ पूरण कीन्ह्यो अब याहींते चन्दन बाग केरि सबगाथ ॥ वन्दन करिकै पितु माताके दूनों धरौं चरणपर माथ १०४ पूरि तरंग यहाँ सों द्वैगै तब पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छा यही मोरि भगवन्त १०५ इति श्रीलखनऊनवासि (सी, आई, ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारा- यणजीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गतपँडरीकलांनिवासिमिश्रवंशोद्भवबुधकृपा- शंकरसूनुपं०ललिताप्रसादकृतचंदनवाटिका युद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥