भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 587

आल्हाखण्ड । ५८६ दैया दैया करि मरि जावै ज्यहिनहिंचरणकमलआधार४ छूटि सुमिनी गै देवी कै शाक्ता सुनो शूरमन क्यार ॥ चन्दन वगिया को कटवाई ठाकुर उदयसिंह सरदार ५ अथ कथाप्रसंग ॥ ब्रह्मा ठाकुर त्यहि समया मा साँचो मरणहार दिखलाय ॥ गाँसी खटकति है मस्तक में कोखिन सेल्ल कटारी घाय १ बेला रानी त्यहि समया मा लै शिर तहाँ पहुँची जाय ॥ जहाँ चँदेला सुख शय्या मा करहत रहै बाण के घाय २ धरि शिर दीनह्यो तहँ ताहर को बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥ कीनि आज्ञा पूरण स्वामी मारा समर आपनो भाय ३ सुनिकै बातैं ये बेला की देखन लाग चँदेलाराय ॥ जब शिर दीख्यो सो ताहरका तब मनमोद भयो अधिकाय ४ ब्रह्मा बोले फिरि बेला ते प्यारी साँच देयँ बतलाय ॥ मैके ससुरे सब सुख तुम्हरे चाहौ रहौ तहाँ तुम जाय ५ नहीं भरोसा अब जीवनका प्यारी प्राणरहे नगच्याय ॥ इतना कहिकै ब्रह्मा ठाकुर सुरपुर गयो तड़ाकाधाय ६ बेला गिरिकै रोवन लागी कारण करनलागि अधिकाय ॥ जो मैं जनतिउँ यह गति होई काहे हनति समर में भाय ७ हाय ! विधाताकी मर्जी यह हमरे बूत सही ना जाय ॥ चटक चूनरी ना मैली भै ना हम धरा सेज पै पाँय ८ खबरि पहुँकिगै यह महलन में रानी गिरीं भरहरा खाय ॥ हाहाकार परा मोहबे मा कोऊ रँधा भात ना खाय ६ ऊदन लाखनि दोऊ आये जहँपर मरा चँदेलाराय ॥ ने समुझायै भल बेलाको रानी शोक देउ विसराय १०