आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१८ आल्हखण्ड । ५८३ बाजत डंका अहंतंका के तम्बुन फेरि पहुँचौ आय १८६ लश्कर पहुँच्यो सब दिल्लीमा घर घर खबर गई यह छाय ॥ बेला मारा है ताहर को कोऊ रँधा भात ना खाय १६० रानी अगमा के महलन मा - पहुँची खबरि तड़ाका आय ॥ को गति वर्णै त्यहि समयकै विपदा गई महलमें छाय १६१ विचरै रानी रनिवास मा गिरि गिरि परै पछाराखाय ॥ रूप शील गुण वर्णन करिकै मनमा बारबार पछिताय १६२ नाहक बेला तू पैदा भइ डारे बंश नाश करवाय ॥ त्वरे वियाहेते गौने लौं जूझे सातपुत्र रणजाय १६३ दियाबैया अब महलन में कोऊ नहीं परै दिखलाय ॥ सातपुत्र की मैं महतारी सो निरवंश डरे करवाय १६४ कैसि निर्दयी बेला ह्वैगै मारेसि समर आपनो भाय ॥ इतना कहिकै रानी अगमा फिरिगिरिगई मूर्च्छाखाय १६५ छाय उदासी गै दिल्ली मा कहूँ नहिं मसातलक झन्नाय ॥ घर घर रय्यत अपने रोवै दर दर गाथ गई यहछाय १६६ बदला लीन्ह्यो चंदेले का बेला समरभूमि में आय ॥ यहि अलबेला अब गाथा को पूरणकीन यहाँते भाय १६७ खेत छूटिगा दिननायक सों झंडा गड़ा निशाको आय ॥ चरि चरि गौवैं घरका डगर्सिं पक्षी चले बसेरन धाय १६८ गिरे आलसी खटिया तकितकि सन्तन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देऊँ मुन्शी सुत जीवो प्रागनरायणभाय १६६ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहें चन्द औ सूर ॥ पालिक ललितेके तबलौं तुम यशसों रहो सदा भरपूर २०० माथ नवावौं पितु माता को जिन बल पूरिभई यह गाय ॥