भारतकोश
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आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

१६ आल्हाखण्ड । ५५८ घोड़ बेंदुला की पीठौ मा ठाकुर उदयसिंह सरदार १६५ मोर्चाबन्दी भै दूनों मा दूनों लड़ैलागि त्याहिकाल ॥ अभिरै क्षत्री अरझारा सों भिड़िगैतहाँ ढाल में ढाल १६६ धाँधू धनुवाँ का मोर्चा भा सय्यदनृपतिग्वालियरक्यार ॥ को गति बरणै रजपूतन कै मारैं दऊ हाथ तलवार १६७ जैसे भेड़िन भेड़हा बैठै जैसे अहिर विडारै गाय ॥ तैसे मारै ताहर नाहर शूरन दीन्ह्यो समर वराय १६८ धाँधू धमकै तहँ तेगा को चमकै चमाचम्म तलवार ॥ अली अली कहि सय्यद दौरै रणमाहोतजातगलियार १६६ बड़ा लड़ैया अंगद राजा गोरै ढूँढ़ि ढूँढ़ि सरदार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १७० सवैया ॥ करहत शूर गिरैं रणखेतन पूरि रही ध्वनि गारु अपारा । मत्त मतंग गिरैं भहराय सो हाय दयी यह होत पुकारा ॥ छूटत तीर सो पूरि रहे तन धूरि उड़ै नहिं कीच अपारा । मीच भई रणशूरन की ललिते मन कायर जात दरारा १७१ कायर भागि चले ललिते अकुलात महामन दुःख न छाये । मोद बढ़यो रणशूरन के बलपूरन के कछु दुःख न आये ॥ कूर कुपूत रहे रजपूत ते मूत भये रण नाम घराये ॥ पूत सपूत महामजबूत सो वूतलड़ै नहिं पाउँ डिगाये १७२ घड़ी लड़ाई भै मारग में पिरथी लाखनि के मैदान ॥ मारे मारे तलवारिन के गिरिगे बड़ेसुघरवाज्वान १७३ मान न रहिगे क्यहु क्षत्रिनके सब के छूटिगये अभिमान ॥

बेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध। ५५६ ' १७ आदि भयङ्कर के ऊपर ते गरुई हाँक देय चौहान १७४ मारो मारो ओ रजपूतो डोला लेवो तुरत छिनाय ॥ जान न पावैं द्यावालिवाले इनके देवो मूड़ गिराय १७५ गरुई हाँकै सुनि पिरथी की जूझन लागि सिपाही ज्वान ॥ उड़ै बेंदुला बघऊदन का खाली होत जात मैदान १७६ धाँधू धनुवाँ के मुर्चा में बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ अंगद राजा के मुर्चा मा सय्यद बनरसका सरदार १७७ औरो क्षत्री समरभूमि मा दूनों हाथ करैं तलवार ॥ को गति बरणै त्यहि समया कै अद्भुत होय तहाँपरमार १७८ पैग पैग पै पैदल गिरिगे दुइ दुइ कसी गिरे असवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार १७६ सोहैं लहासैं तहँ हाथिन की छोटे पर्वत के अनुहार ॥ परी लहासैं जो घोड़न की तिनकोजानों नदीकगार १८० मुण्डन केरे मुड़चौड़ा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ डोला सौंप्यो फिरि धनुवाँको चलिभाकनउजकासरदार१८१ जौनी दिशिको लाखनि जावैं तादिशि होय घोरघमसान ॥ बड़े लड़ैया दिल्ली वाले ताहर समरधनी चौहान १८२ हनि हनि मारैं रजपूतन का घायल होयँ अनेकनज्वान ॥ मान न रहिगा क्यहु क्षत्रीका सब के टूटिगये अरमान १८३ फूटि फूटि शिर चूरण ह्वै गे पूरण भयो समर मैदान ॥ कहँलग गाथा त्यहि समयाकै ललिते करैयहांपर गान १८४ सो भल जानतहैं नीकी बिधि जो यह दीख्यो युद्ध ललाम ॥ सम्मुख जूझैं जे मुर्चा में ते सब जायँ रामके धाम १८५ यही तपस्याहै क्षत्री कै सम्मुख लड़ै समर मैदान ॥

१८ आल्हखण्ड । ५६० तन धन अप्पैं समरभूमि मा पावै सदा जगत में मान १८६ सज्जन मानै के भूखे हैं दुर्जन सहैं सदा अपमान ॥ मान न पावै नरदेही मा जीवतजानोश्वान निदान१८७ मान के भूखे लाखनिराना ठाना कठिन तहाँ संग्राम ॥ जौनौदिशि को लाखनिजावैं तादिशिहोतजातहंगाम १८८ लाखनिराना के मारुन मा आरी भये सिपाही ज्वान ॥ कायर भागे समरभूमि ते शूरन कीनघोरघमसान १८६ यहु महाराजा कनउजवाला मारत चला अगारी जाय ॥ आदिभयङ्कर जहाँ हाथी पर सोहत बैठि पिथौरा राय १६० तहँ कनउजिया कनउजवाला आला अटा तड़ाका जाय ॥ आदिभयङ्कर ते ललकारा यहु महराज पिथौरा राय १६१ लाखनि पगिया ना अटकीहै रण मा प्राण गँवावो आय ॥ प्यारे बेटा तुम ताहर सम मानो कही कन्नौजी राय १६२ निमक चँदेले का इन खावा दूनों भाय बनाफरराय ॥ ये मरिजावैं सँग डोला के उनकेनमक अदाहैजायँ १६३ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है अनहक प्राण गँवावो आय ॥ बारह रानिन में इकलौता यहहमसुनाकन्नौजीराय १६४ त्यहिते तुमका समुझाइत हैं चुप्पै कूच जाउ करवाय ॥ इतना सुनिकै लाखनि बोले साँची सुनौ पिथौरा राय १६५ तीनि महीना औ त्यारादिन ' ऊदन कठिन कीन तलवार ॥ लै कै पैसा सब गाँजर का पठवा कनउज के दरबार १६६ गंगा कीन्हीं हम ऊदन ते देवे साथ बनाफरराय ॥ हमें मुनासिब यह नाहीं है जोअबकूचजायँ करवाय १६७ करब प्रतिज्ञा अब हम पूरी लड़िबे खूब पिथौराराय ॥

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बेलाकेगौनेका द्वितीययुद्ध । ५६१ १६ पाँव पिछारी का धरिबे ना बहुतन धजी २ उड़िजाय १६८ पता लगावै हौँ लाखनि का आल्हा केर लहुरवा भाय ॥ मारत मारत रजपूतन को पहुँचा जहाँ पिथौराराय १६६. तीर कमनिया लै हाथे मा मारन हेतु भयो तैयार ॥ तब ललकारा नर नाहर यहु ठाकुर उदयसिंह सरदार २०० तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है राजा समरधनी चौहान ॥ नहीं बराबरीके लखराना जोतुम लीन्ही तीर कमान २०१ सुनिकै बातें बचऊदन की कायल भये बीर चौहान ॥ चुप्पै हौदा पर रख दीनी राजा अपनी तीर कमान २०२ यहु दलगंजन की पीठी मा ताहर आय गयो त्यहिबार ॥ भये कनौजी त्यहिके सम्मुख लागे करन तहाँ पर मार २०३ ऊदन अंगद का मुर्चा भा दोऊ लड़न लागि सरदार ॥ दोऊ मारैं तलवारी सों दोऊ लेयँ ढाल पर वार २०४ तब ललकार्यो फिरि धाँधू को यहु महराज पिथौराराय ॥ जाय न डोला अब मोहबे का लावो जाय तड़ाकाधाय २०५ इतना सुनिकै धाँधू चलिभे डोला पास पहुँचे जाय ॥ तब ललकारा तहँ धनुवाँने क्षत्री खबरदार है जाय २०६ पाँव अगाड़ी का डोरेना नहिं यमपुरी देउँ दिखवाय ॥ कहा न माना कछु धनुवाँका धाँधू चला तड़ाका धाय २०७ तेलिके बच्चा कब्बा खैहौँ लुच्चा ठाढ़ होय यहिवार ॥ सच्चा लड़का जो क्षत्रीका तौ मुखघाँसिदेउँ तलवार २०८ इतना कहिकै धांधू क्षत्री अँगुरिन भालालीन उठाय ॥ ताकि कै मारा सो धनुवाँ का परिगा घाव जाँघ पर आय २०६ गिरिगा धनुवाँ जब खेतन मा डोला तुरत लीन उठवाय ॥ ३६

२० आल्हखण्ड । ५६२ डोला उठिगा जब बेला का सय्यदगयो तड़ाका आय २१० औ ललकारा त्यहि धाँधू का अब ना धस्यो अगारी पाँय ॥ जान न पैहौ तुम सय्यद ते क्षत्री साँच दीन बतलाय २११ इतना सुनिकै अंगद राजा तहँ पर गयो तड़ाका आय ॥ भूरी हथिनी के चढ़वैया आये तहाँ कनौजीराय २१२ ताहर नाहर दलगंजन पर सोऊ बेगि पहुँचा आय ॥ कठिन लड़ाई भै डोलों पर हमरे बूत कही ना जाय २१३ को गति बरणै त्यहि समयाकै बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ सुनिसुनि गाजैं रजपूतन की कायर डारिभागि हथियार २१४ को गति बरणै रण शूरनकी दूनों हाथ करें तलवार ॥ कीरति प्यारी जिन क्षत्रिन को तिनको भलाकरैं करतार २१५ कीरति वाले लाखनि ताहर ठाना घोर शोर घमसान ॥ यहु महराजा कनउज वाला लीन्ही गुर्ज तड़ाकातान २१६ ऐंचिकै मारा सो ताहर के मस्तक परी घोड़के जाय ॥ घोड़ा भाग्यो तहँ ताहर का डोला लीन कनौजीराय २१७ बिना नृपति के सब सेना तहँ रणमा कौन भांति समुहाय ॥ बिन बर कन्या ज्यों मड़ये मा भौंरी कौन करावन जाय २१८ दुलहिन दुलहा की समता मा ममता कौन खवैया भान ॥ मिलै रुपैया बरतौनी ना तबलग देखिपरे तहँ लात २१६ तैसे मुर्चा की बातें हैं यारो जानिलेउ सब घात ॥ घोड़ा भाग्यो जब ताहर का लाग्योनहीं क्यहूकी लात २२० डोला चलिभा तब बेला का जहँ पर रहै चँदेलाराय ॥ ब्रह्मा ठाकुर के तम्बू मा द्वैगै भीरभार अधिकाय २२१ बाजे डङ्का अहतङ्का के शङ्का सबन दीन बिसराय ॥

बेलाकेगौनेकाद्वितीययुद्ध । ५६३ २१ देवा सय्यद ऊदन लाखनि सबको मिलाचँदेलाराय २२२ मिला भेंट करि सब काहुन सों तम्बू बैठिगये सब आय ॥ कीन बड़ाई लखराना की तहँ पर खूब बनाफरराय २२३ सच्ची बातें उदयसिंह की नहिंकहुँ लसरफसर ब्यवहार ॥ बड़ा प्रतापी रण मण्डल मा ठाकुर उदयसिंह सरदार २२४ पाग बैंजनी शिरपर सोहै टिहुनन धरी ढाल तलवार ॥ चढ़ा उतारू भुजदण्डै हैं आनन पङ्कजकेअनुहार २२५ सत्य बड़ाई की लाखनि की भे सब खुशी तहाँ सरदार ॥ जा बिधि चलिकै सब मोहबे ते पहुँचे दिल्ली के दरबार २२६ कीनि नौकरी ज्यहि प्रकार ते कुण्डल जौन भांतिसों लीन ॥ सो सब गाथा तहँ ब्रह्मा ते ठाकुरउदयसिंहकहिदीन २२७ खेत छूटिगा दिननायक सों झण्डा गड़ा निशाको आय ॥ तारागण सब चमकन लागे सन्तन धुनी दीनपरचाय २२८ राम राम की मन रटलाये लीन्ह्यनि अंग बिभूति रमाय ॥ डारि बघम्बर या मृगछाला आला परब्रह्म को ध्याय २२६ तपनि मिटाई सब देही की रघुबर नाम औषधी पाय ॥ यह सुखदायी सब संतन को या बलदेवैं निशाबिताय २३० जब लग रैहै संजीवनि यह तबलम धर्मध्वजा फहराय ॥ माथ नवावों पितु माता को जिनबलगाथगयोंसबगाय२३१ आशीर्वाद देउँ मुंशीसुत जीवो प्रागनारायण भाय ॥ हुकुम तुम्हारो जो पावत ना ललितेकहतकौनविधिगाय२३२ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललिते के तबलौं तुम यशसों रहौ सदा भरपूर २३३ विपति निवारण जगतारण के दूनों धरौं चरणपर माथ ॥

२२ आल्हाखण्ड । ५६४ बैलारानी के गौने की पूरण भई दूसरी गाथ २३४ पूरि तरंग यहाँ सों द्वैगे तव पद सुमिरि भवानीकन्त ॥ राम रमा मिलि दर्शन देवैं इच्छायही मोरि भगवन्त २३५ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजवाबूप्रयागनारायण जीकी आज्ञानुसारउन्नामप्रदेशान्तर्गतपँड़रीकलानिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृत बेलागमन द्वितीययुद्धवर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ बेलागमनद्वितीययुद्धसमाप्त ॥ इति ॥

अथ आल्हखण्ड ॥ बेलाऔरताहरकायुद्धवर्णन ॥ सवैया ॥ मैं बृषभान लली बिनवों सो अली सँग कुंजन जातनितय । गावत बेनु बजावत आवत मोहनलालहु नित्त तितय ॥ श्यामह श्याम भये ज्यहि ठौर सो और बखानकरै को कितय । गावत गीत सबै ललिते ज्यहि आवत जौन जहाँलों जितय १ सुमिरन ॥ राधा रानी ठकुरानी के दूनों धरौं चरण पर माथ ॥ मोहिं भरोसा अब तेरो है स्वामिनि पूरिकरो यह गाथ १ कण्ठ में बैठै तुम कण्ठेश्वरि भुज बल बैठिजाय हनुमान ॥ बैठि सरस्वति जा जिह्वामा भूले अक्षर करों बखान २ झाँग भवानी महरानी के बन्दन करों जोरि दोउ हाथ ॥ झाँग न होती जो दुनिया मा ललिते कौन देत तब साथ ३

२ आल्हखण्ड । ५६६ चढ़ै तरंगै जब भांगन की आँगन देखि परै सुरलोक ॥ दुख नहिं ब्यापै कछु देहीमा मनके छूटिजात सब शोक ४ भाँग घोटिकै नित प्रति पीवै जीवै वर्ष एक शत एक ॥ हर को ध्यावै तब सुखपावै पूरी होय तबै यह टेक ५ छूटि सुमिरनी गै देवन कै शाखा सुनो शूरमन क्यार ॥ बेला काटी शिर ताहर का सोई गाथ कहौं विस्तार ६ अथ कथाप्रसंग ॥ जहाँ चँदेले ब्रह्मा ठाकुर बेला गई तहाँ पर धाय ॥ बैठी पलँगा कर पंखालै लागी करन पवन सुखदाय १ ज्वरि २ बहियां हरि २ चुरियाँ शोभा कही बूत ना जाय ॥ शची मेनका की गिन्ती मा बेला रूप राशि अधिकाय २ यहु अलवेला ब्रह्मा ठाकुर बेलै बोला वचन सुनाय ॥ टरिजा टरिजा री आँखिनते दीखे गात सबै जरिजायँ ३ घटिहा राजा की कन्या ते कासुखहोय मोहिंअधिकाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ४ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है जैसी कहौ चँदेलेराय ॥ राज कुटुँब सब अपनो तजिकै आइन चरण शरणमें धाय ५ सुनि सुनि बातैं अब प्रीतमकी छाती घाव होत अधिकाय ॥ परवश कन्या की गति जैसी तैसी रही चँदेलेराय ६ ऐसी तुमको अब चहिये ना जैसी सूखी रहे सुनाय ॥ सुरपुर अहिपुर नरपुर माहीं प्रीतम कौन मोर अधिकाय ७ प्यारे प्रीतम इक तुम्हीं हैं। साँचो साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये बेला की बोला फेरि चँदेलाराय ८ मूड़ काटिकै अब ताहरका प्यारी मोहिं देउ दिखलाय ॥

बेलाताहरकामैदान । ५६७ ३ घाव करेजे का तब पूरे औ सुख सम्पति मोहिं सुहाय ६ इतना सुनिकै बेला बोली स्वामी बचन करो परमान ॥ कपड़ा घोड़ा दै कोड़ा निज पठवो मोहिं समर मैदान १० एक लालसा पै डोलति है स्वामी पूरिकरो यहि काल ॥ नगर महोबा मोहिं पठवावो दर्शन करों सासुके हाल ११ इतना सुनिकै ब्रह्मा बोले जावो साथ लहुरवाभाय ॥ बेला बोली तब स्वामी ते यहनहिंउचितमोहिंदिखलाय १२ ब्रह्मा बोले फिरि लाखनि ते तुमहीं जाउ कनौजीराय ॥ बेला बोली फिरि स्वामी ते यहनहिंउचितमोहिंदिखलाय १३ बदला लैहैं संयोगिनि का रखिहैं मोहिं कनौजे जाय ॥ दुई हँसौवा दुहुँ तरफा का प्रीतम करिहौ कौन उपाय १४ ब्रह्मा बोले फिरि आल्हा ते तुम चलिजाउ बनाफरराय ॥ यह मन भाई तब बेला के पलकी चढ़ी तड़ाकाधाय १५ चढ़ि पचशब्दा हाथी ऊपर अल्हा ठाकुर भये तयार ॥ डोला चलिभा फिरि बेला का संगै चले बहुत असवार १६ यह गति देखी माहिल ठाकुर लिल्ही उपर भये असवार ॥ जहाँ पर बैठे पृथीराज हैं पहुँचा उरई का सरदार १७ बड़ी खातिरी राजा कीन्ह्यो अपने पास लीन बैठाय ॥ जो कछु गाथा थी तम्बू की माहिल यथानथ्य गा गाय १८ तब महराजा दिल्लीवाला चौंडे तुरत लीन बुलवाय ॥ खबरि सुनाई सब चौंड़ा को जो कछु माहिल दीन बताय १६ नार कँकरिहा पर तुम घेरो डोला लावो बेगि छिनाय ॥ हुकुम पायकै महराजा को फौजें तुरत लीन सजवाय २० चढ़ि इकदन्ता हाथी ऊपर चौंड़ा कूचदीन करवाय ॥

आल्हखण्ड । ५६८


बाजत डंका अहलंका के पहुँचा नार उपरसो आय २१ दीख्यो आल्हा को चौंडाने गरुई हाँक कहा गुहराय ॥ डोला धरिकै अब बेला का जावो लौटि बनाफरराय २२ हुकुम पिथौरा का याही है आल्हा साँच दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये चौंड़ा की बोला फेरि बनाफरराय २३ डोला लौटनको नाहीं है चौंड़ा काह गये बौराय ॥ एक पिथौरा की गिन्ती ना लाखन चढ़ैं पिथौरा आय २४ नगर मोहोवे डोला जाई चौंड़ा साँच दीन बतलाय ॥ गा हरिकारा फिरि तहँना ते जहँना बैठ बनाफरराय २५ डोला घेरा है बेला का बोला हाथ जोरि शिरनाय ॥ इतना सुनिकै ऊदन ठाकुर तुरतै कूच दीन करवाय २६ जहँ पर फौजैं हैं चौंड़ा की पहुँचा तुरत लहुरवाभाय ॥ हाथ जोरिकै ऊदन बोले दादा कूच जाउ करवाय २७ इतना सुनिकै चौंड़ा बक्शी तुरतै हुकुम दीन फर्माय ॥ जान न पावैं मोहवे वाले सब के देवो मूड़गिराय २८ हुकुम चौंड़िया का पावतखन क्षत्रिन खैंचि लीन तलवार ॥ झुके सिपाही दुहुँ तरफा के लागी होन भड़ाभड़ मार २९ गोली ओला सम बरसी तहँ कोताखानी चलीं कटार ॥ भा खलभल्ला औ हल्ला अति जूझन लागि शूर सरदार ३० कटि कटि कल्ला गिरैं बछेड़ा घूमैं मूड़ बिना असवार ॥ खट खट खट खट तेगा बोलैं बोलैं छपक छपक तलवार ३१ झल् झल् झल् झल् झीलमझलकें नीलम रंग परै दिखलाय ॥ चम् चम् चम् चम् छूरीचमकैं कउँधालपकनिखङ्गदिखाय ३२ मर् मर् मर् मर् दालैंच्वालैं तेगा टन्र टन्र टन्राय ॥

बेलाताहरकामैदान । ५६६

सन् सन् सन् सन् गोली बरसें तीरन मन्न मन्न गा छाय ३३ धम् धम् धम् धम् बजैं नगारा मारा मारा परै सुनाय ॥ बड़ी खुशहाली रणशूरन के कायेर गये तहाँ सन्नाय ३४ कायर सोचत मन अपनेमा नाहक प्राण गँवाये आय ॥ माठा रोटी घरमा खाइत आपनि भैंसिचराइत जाय ३५ यह गति जानित जो पहिलेते काहे फँसित समर में आय ॥ नई बहुरिया घरमा बैठी कैसे धरा धीर उरजाय ३६ हाय रुपैया बैरी ह्वैगे हमरे गई प्राणपर आय ॥ को समुझाई घर दुलहिनिका देवी देवता रहे मनाय ३७ कायर बिनवैं मन सूरजते पश्चिम जाउ आज महराज ॥ तौ हम भागैं समरभूमि ते औ रहिजायजगतमें लाज ३८ शूर सिपाही ईजतिवाले दहिनी धरैं मुच्छ पर हाथ ॥ हनि हनि मारैं समरभूमि मा कटिकटिगिरैं चरणऔमाथ ३९ को गतिवरणै त्यहिसमया कै बाजै घूमि घूमि तलवार ॥ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी धार ४० मुण्डन केरे मुड़चौरा भे औ रुण्डन के लगे पहार ॥ घोड़ बेंदुला के ऊपर ते नाहर उदयसिंह सरदार ४१ फिरि फिरि मारै औ ललकारै बेटा देशराज का लाल ॥ गरुई हाँकैं सुनि ऊदन की कम्पित होयँ तहाँ नरपाल ४२ ऐंड़ लगावै रस बेंदुल के हौदा उपर पहुँचै जाय ॥ मारि महाउत को हनिडारै औ असवारै देय गिराय ४३ • यह गति दीख्यो जब ऊदन कै चौंड़ा हाथी दीन बढ़ाय ॥ औ ललकारा समरभूमि मा ठाढ़े होउ बनाफरराय ४४ गरुई हाँकैं सुनि चौंड़ा की ऊदन घोड़ा दीन उड़ाय ॥

६ आल्हखण्ड । ५७० भाला मारा इकइन्ताके भाग्यौ तुरत पछाराखाय ४५ खेत छूटिगा तब चौंड़ा ते आल्हा कूच दीन करवाय ॥ डोला पहुँचा बरइन पुरवा बेला बोली बैन सुनाय ४६ नगर मोहोबा का याही है 'साँची कहौ बनाफरराय ॥ नगर मोहोवे का पुरवा यह बेला रानी परै दिखाय ४७ खबरि पायकै सुखिया बारिनि तहँ पर गई तड़ाका आय ॥ संग सहेलिन को लैके सो परछन कीन तहाँपर जाय ४८ चलिभा डोला फिरि आगे को मालिनि पुरै पहुँचा आय ॥ खबरि पायकै फुलियामालिनि सोऊ चली तड़ाका धाय ४९- संग सहेलिन को लीन्हे सो डोला पास पहुँची आय ॥ कीनि आरती सो बेला की देखिकै रूप गई सन्नाय ५० हाय ! विधाता यह का कीन्ही सुरपुर पती दीन पठवाय ॥ इतना कहिकै फुलियामालिनि दाँते अँगुरी लीन चपाय ५१ सुनिकै बातैं ये फुलिया की बेला गयो क्रोध उरछाय ॥ हुकुम लगायो इक चाकर को जूतिन देवो मूड ठठाय ५२ हुकुम पायकै सो बेला को मारन लाग तड़ाका धाय ॥ आल्हा बोले तब बेला ते यहनहिंतुम्हहिंमुनासिवआय ५३ अवै न डोला गा मोहबे का रैयानि प्रथम रहिउ पिटवाय ॥ सुनिकै बातैं ये आल्हा की बेला तुरत दीन छुड़वाय ५४ मालिनि पुरवा ते डोला चलि पहुँचा नगर मोहोबे आय ॥ खबरि पायकै बारह रानी मल्हनामहलगई सबधाय ५५ द्यावलि सुनवाँ फुलवा मल्हना द्वारे सबै पहुँची आय ॥ कीन आरती तहँ बेला की सबहिनदुःख शोकविसराय ५६ संगै लैके फिरि बेला का महलन गई तड़ाका आय ॥

[Header] बेलाताहरकामौदान । ५७१ ७

भा अति मेला तहँ नारिन का शोभा कही वूत ना जाय ५७ मुहँ दिखलाई रानी मल्हना तहँपर दीन नौलखाहार ॥ पायँ लागिकै बेला रानी कङ्कण तुरतै दीन उतार ५८ भीर मेहरियन कै हटिगै जब अक्सर बहू रही त्यहिताँय ॥ मल्हना पूँछै तब बेला ते साँची साँच देय बतलाय ५६ बालम तुम्हरे अब कैसे हैं कहँ कहँ लगे अंग किनघाय ॥ इतना सुनिकै बेला बोली दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ६० बाईं दहिनी दूउ कोखिन मा लागीं सेल कटारी घाय ॥ गाँसी खटकति है मस्तक में मैया बिपति कही ना जाय ६१ वातैं सुनिकै ये बेला की मल्हना गिरी पछारखाय ॥ कथा पुराणन की वातैं बहु बेला कहा तहाँ समुझाय ६२ कथा सुनाई गंधारी की ज्यहि के मरे एकशत पूत ॥ कथा बताई यदुनन्दन की जहाँ मरिगये सबै रजपूत ६३ कथा बखानी रघुनन्दन की नृपपद छूटि मिला बनबास ॥ कही कहानी दशकन्धर की ज्यहिके भई वंशकी नाश ६४ बेला बानी सुनि रानी सब तुरतै शोक दीन बिसराय ॥ प्रसव वेदना ज्यहि पर बीती जीतीस्वईशोक अधिकाय ६५ बेला बोली चन्द्रावलि ते ननँदी साँच देयँ बतलाय ॥ भैया अपने को सतखण्डा ननँदी मोहिं देय दिखलाय ६६ इतना सुनिकै चन्द्रावलि तहँ गै सतखण्डा तुरत लिवाय ॥ को गति बरणै सतखण्डाकै साँचो इन्द्र धाम दिखलाय ६७ चँदन किंवरिया जहाँ लागी हैं खम्भन रत्न जटित को काम ॥ कैसो सम्भ्रम मन जो होवै बैठत लहै तहाँ विश्राम ६८ बेला पहुँची जब छज्जा पर पखिन भीर दीख अधिकाय ॥

[Header] ८ आल्हखण्ड । ५७२

कोकिल हंस मोर पारावत तीतर लवा सुवा सुखदाय ६९ शोभा देखत तहँ छज्जा की बेला बार बार पछिताय ॥ जीवत प्रीतम हमरे होते तौ सुखभोग होत अधिकाय ७० आज काल्ह दिन प्रीतम भेलैं ताते नरक सरिस दिखलाय ॥ हाय ! विधाताकी मरजी अस भारी विपति गई शिर आय ७१ प्रीतम प्यारे के सतखण्डा हम पर फाटि गिरो अरराय ॥ यह मन विनवत बेला रानी महलन गई तड़ाका आय ७२ बेला बोली फिरि मल्हनाते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ मोरि लालसा यह डोलति है चन्दन वगिया देउ दिखाय ७३ सुनिकै बातें ये बेला की पालकी तुरत लीन मँगवाय ॥ बैठि पालकी महरानी सब चन्दन बाग पहुँचिं जाय ७४ पुष्पवाटिका तहँ राजत है छाजत सबै दिनन ऋतुराज ॥ बेला चमेली औ नेवारकी पंक्तीं रहीं एक दिशि छाज ७५ बिसुनकान्ता कहुँ कहुँ फूले कहुँ कहुँ फूले सुर्ख अनार ॥ श्वेत रक्त औ मधुर गुलाबी पाटल फूले भांति अपार ७६ फुली चांदनी श्वेत वरणहैं जिन पर केलि करत बहुभृंग ॥ को गति वरणै दुपहरिया कै ज्यहिको रक्तवरण है रंग ७७ श्वेत रक्त औ मधुर गुलाबी सब विधि फूलि रहा करवीर ॥ कदली केंवँड़ा यकदिशि राजत छूटत देखि मुनिनको धीर ७८ श्वेत रक्त तहँ चन्दन छाजैं राजैं कोकिल मोर चकोर ॥ पीव पपीहा की रट सुनिकै बिरहिनि पीर होय अतिघोर ७६ यह सुख सम्पति बेला लखिकै कीन्ह्यो घोर शोर चिग्घार ॥ जितनी रानी थीं वगिया में सबहिन छांड़िदीन डिंडकार ८० मोती ऐसे आँसू ढरकें बेला हृदय शोक गा छाय ॥

तब समुझावै मलहना रानी बहुवर शोक देउ बिसराय ८१ पारस पत्थर घर तुम्हरेमा बहुवर बैठिकरो तुम राज ॥ हुकुम तुम्हारो रैयति मानी द्वैहैं सबै धर्म के काज ८२ द्यावलि बोली फिरि बेला ते रानी बचन करो परमान ॥ धर्म सनातन को याही है राखै सासु श्वशुरको मान ८३ इतना सुनिकै बेला बोली यहु दुख दून तुम्हारो दीन ॥ घर बैठार्यो दोउ पुत्रन को मोहबा बंशनाश तुम कीन ८४ इतना सुनिकै द्यावलि बोली साँची मानो कही हमार ॥ यह सब करतब है माहिल कै जिनके चुगुलिनका बैपार ८५ सवन चिरैया ना घर छोड़ै ना बनिजरा बनिजको जाय ॥ चुगुली करिकै माहिलठाकुर मोको तुरत दीन निकराय ८६ गे जगनायक जब कनउजका आवैं नहीं बनाफरराय ॥ मैं समुझायों दुउ भाइन का लाये संग कनौजीराय ८७ घाटबयालिस तेरह घाटी सब रुकववा पिथौराराय ॥ जीति पिथौरा को लखराना सबियाँ लीन्हे घाट छँड़ाय ८८ पान धरायो जब गौने का तब नहिं बीरा कऊ चबाय ॥ बीरा लीन्ह्यो जब ऊदन ने ब्रह्मा लीन्ह्यो तुरत छँड़ाय ८६ यह सब करतब है माहिल कै डार्यनि वंशनाश करवाय ॥ काल नगीचे ज्यहि के आवै त्यहिकै देवै बुद्धि नशाय ९० इतना कहतै तहँ द्यावलि के आल्हा गये तड़ाकाआय ॥ बेला बोली तहँ आल्हा ते कीरतिसागर लयो दिखाय ९१ यह मन भाई सब रानिनके पलकी चढ़ीं तड़ाकाधाय ॥ चलीं पालकी महरानिन की संगै चले बनाफरराय ६२ कीरतिसागर फिरि आई सब नौका पास लीन मँगवाय ॥

१० आल्हखण्ड । ५७४ भये खेवैया आल्हा ठाकुर पहुँचे पार तड़ाका आय ६३ अतिशुभ मंदिर ब्रह्मानंद का शोभा कही बूत ना जाय ॥ गई तड़ाका सब महरानी चकितलखै चहूँदिशिधाय ६४ पंसासारी ब्रह्मानँद की बेला नजरि परी सो आय ॥ तब अलबेला बेलारानी बोली सुनो बनाफरराय ६५ बड़े खिलारी तुम चौपरिके सो अब मोहिं देउ सिखलाय ॥ इतना सुनिकै आल्हा बैठे चौपरि तहाँ दीन फैलाय ६६ बेला खेलै पंसासारी अंचल अपन उड़ावतिजाय॥ यह गति देखी आल्हा ठाकुर नीचेलीन्ह्यो शीश झुकाय६७ बहुतक रूप धरे बेला ने आल्है मोह रही करवाय ॥ चाटक नाटक करि सबहारी मोहा नहीं बनाफरराय ६८ रूप भयङ्कर दर्शवों धरिकै डाइन बैठिगई मुहबाय ॥ यहिका लखिकै आल्हा ठाकुर तुरतै खाँड़ा लीन उठाय ६९ गर्जत बोले आल्हा ठाकुर का तू मोहिं रही डरवाय ॥ देखि भयङ्कर क्षत्री डरपै कीरति जावै सबै नशाय १०० हो अपकीरति जब दुनिया में तब तो मृत्यु नीकि है जाय ॥ ऐसे वैसे हम क्षत्री ना जो अब देवैं धर्म नशाय १०१ रूप मोहनी माता जाना डाइन शत्रुरूप दिखलाय ॥ अब तू पलटै कित स्वरूप को कित तू करै समररण आय १०२ इतना सुनतै बेलारानी प्रथमै लीन्ह्यो रूप बनाय ॥ पाप तुम्हारे कछु मनमें ना साँचे शूर बनाफरराय १०३ -योंचे तुमका हम तम्बूमा अपने लाइन साथ लिवाय ॥ संग लहुरवा का लीन्ह्यो ना हमरे उमर सरिससोआय १०४ संगलकड़ियनमिलि अग्नी को ज्वाला अधिक २ अधिकाय ॥

बेलाताहरकामैयान । ५७५ ११ यामें संशय कछु नाहीं है बिप्रनमोहिं दीन बतलाय १०५ पै तहँ सज्जन औ दुर्जनका मंद औ तीक्ष्ण भेदहै भाय ॥ सज्जनक्षत्रीअमझकलियुगमा नहिंकहुँबरनघरनअधिकाय १०६ जस तुम द्यावलि के उपजेहौ कीरति रही लोक में छाय ॥ उत्तम करणी करि नर सज्जन कीरतिध्वजा देयँ फहराय १०७ धर्म नशावैं ते मरिजायैं जिन अपकीरति बहुतसुहाय ॥ साँचे याँचे तुम क्षत्री हौ कीरतिकहीलोकसबगाय १०८ धर्म पतिव्रत के शपथन ते आशिर्बाद बनाफरराय ॥ कीरति गाई जो सज्जन की गावतस्रऊ सरिसह्वै जाय १०६ सज्जन गावै गाय सुनावै पूरो अर्थ देय बतलाय ॥ जो मन भावै क्यहु सज्जन के पावै अमरलोक सो भाय ११० ऐसे कीरति के सागर तुम साँचे धर्म बनाफरराय ॥ इतना कहतै तहँ बेला के मलहनाआदि गईं सब आय १११ बैठिकै नैया सब महरानी सागर पार पहुँचीं जाय ॥ बारह ताल हते मोहबे में बेला दीख सबनको धाय ११२ बेला बोली फिरि मल्हना ते दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ मिलै आज्ञा मोहिं माता की लस्करजाउँ तड़ाकाधाय ११३ कीनि प्रतिज्ञा हम प्रीतम सों माता साँच देयँ बतलाय ॥ मूड़ काटिकै हम ताहरको औ स्वामीको देब दिखाय ११४ जग मर्यादा राखन हेतू सेवक भाव देब दिखलाय ॥ प्रीतम प्यारे की आज्ञा सों जीतोंसमरसगानिजभाय ११५ मोहिं विधाता की मर्जी थी अनरथ रूप दीन उपजाय ॥ अर्थ न पावा कछु देही का भइजगदेह अकारथ माय ११६ स्वारथ प्रीतम के सँग होती सो विधि दीन वियोग कराय ॥

१२ आल्हखण्ड । ५७६ जन्म अकारथ यहु दुनियामाँ कौनीभाँति काटिहौं माय ११७ नैनन योवन औ बैनन को नहिं कछु पूरभयो व्यवहार ॥ अंग न पर्शा हम प्रीतम का ना पद पूर भयो भर्त्तार ११८ सदा अभागी नर नारिन को नाहक रचा नही कर्त्तार ॥ कर्म शुभाशुभ जो लाग्यो है सोई भोगि रहा संसार ११९ यहै सोचिकै मन अपने मा आयसु देउ तड़ाका माय ॥ समय किफायत गाथा भारी आरी कहे जान है जाय १२० इतना सुनतै मल्हना रानी मनमा बार बार पछिताय ॥ दुःख विधाता हमका दीन्ह्यो गाथा कही कहाँलगजाय १२१ इतना सोचत मन अपने मा आयसु फेरि दीन हर्षाय ॥ चरण लागिकै महरानी के बेला कूच दीन करवाय १२२ संग धनाफर आल्हा ठाकुर पलकी चली तड़ाका धाय ॥ बेला बोली तहँ आल्हा ते साँची सुनो बनाफरराय १२३ दखौं चौतरा गजमोतिनि का यह मन गई लालसा छाय ॥ इतना सुनतै आल्हा ठाकुर सिरसा चले तड़ाकाधाय १२४ जहाँ चौतरा गजमोतिनि का डोला तहाँ दीन धरवाय ॥ उतरिकै डोला ते बेला तब चन्दन अक्षत फूलमँगाय १२५ कीन चबुतरा की पूजा भल मन में बार बार तहँ ध्याय ॥ सतीशिरोमणिगजमोतिनिजो साँचे शूर बनाफरराय १२६ आभा बोलै तौ चौराते ज्यहि संतोष मोहिं है जाय ॥ बोली आभा गजमोतिनि की माहिल डारे कन्त मराय १२७ सत्त विधाता मोको दीन्ह्यो सत्ती भयूँ यहां पर आय ॥ तीनि महीना सत्रह दिनमा सब महनामथ जायपटाय १२८ दिल्ली मोहबा द्वउ शहरन में राँड़ै राँड़ै परै दिखाय ॥

बेलाताहरकामैदान । ५७७ १३

आगा सुनिकै बेला बोली बहिनि साँचदेयँ बतलाय १२६ हम तो रण्डा वादिन जाना जादिन मरे बीर मलखान ॥ कीरति पायो जग मण्डल में तुमको सत्तदीन भगवान १३० करि परिकरमा फिरि चौराकी पलकी चढ़ी तड़ाकाधायै ॥ दावे लश्कर को आवति भै मनमें श्रीगणेशपदध्याय १३१ पहर अढ़ाई के अर्सामा डोला गयो फौजमें आय ॥ यह अलबेला बेला रानी प्रीतम पास पहुँचीजाय १३२ देख्यो बेला को ब्रह्मानँद आयसु तुरत दीन फरमाय ॥ मोरि लालसा यह इवालतिहै ताहरशीशदिखावोआय १३३ सुनिकै बातें ये प्रीतम की दोऊ हाथ जोरि शिरनाय ॥ बेला बोली फिरि प्रीतम ते आपन बस्त्र देउमँगवाय १३४ यामें संशय कछु नाहींहै ताहर शीश दिखाउब आय ॥ धीरज राखो अपने मनमाँ अब मैं जात तड़ाकाधाय १३५ सुनिकै बातें ये बेला की सब सामान दीन मँगवाय ॥ भइ मर्दाना बेला रानी शोभा कही बून ना जाय १३६ झीलम बख्तर बेला पहिरी शिरपर धरी बैजनी पाग ॥ को गति बरणै तहँ बेला कै मुखमेंसबै तिलनके दाग १३७ छुरी कटारी बेला बाँधी कम्मर कसी एकतलवार ॥ भाला बरछी लै हाथे मा हरनागर पर भई सवार १३८ बाजे डंका अहलंका के फौजें सबै भई तय्यार ॥ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया नाहर उदयसिंह सरदार १३६ त्यही समैया त्यहि औसर मा बेला पास पहुँचा आय ॥ ऊदन बोले तहँ बेलाते हमको लेवो साथ लिवाय १४० सुनिकै बातें ये ऊदनकी बेला बोली बचन उदार ॥ ३७