भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

पृष्ठ 599, कुल 618 में से

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पृष्ठ 599

४ आल्हखण्ड । ५६८ वार चूकिगे परशू ठाकुर गस्यो वीर सुगन्ता ज्वान ॥ चन्दन खम्भा के मुर्च्चा मा परशू जूझिगये मैदान २३ ऐंड़ा बेंडा ऊदन मारैं सीधा हनैं कनौजीराय ॥ अगलबगल में जगनायकजी बहु रणशूर ढहावत जायें २४ रानी अगमा के महलन के फाटक ऊपर कनौजीराय ॥ सँग जगनायक ऊदन ठाकुर येऊ गये तड़ाका धाय २५ मुर्च्चाबन्दी है बिसहिनि में तहँ पर गये पिथौराराय ॥ सुनी हकीकति लाखनिराना द्वारे जाय गये बिरझाय २६ बदला लेवे संयोगिनि का तब फिरि धरब अगारी पाँय ॥ लैकै डोला अब अगमा का कनउज शहर देहुँ पहुँचाय २७ तौ तौ लड़िका रतीभान का नहिं ई मुच्छ डरौं मुड़वाय ॥ तब जगनायक बोलन लागे मानो कही कनौजीराय २८ जैसे जानैं हम मल्हना को अगमा तैसि हमारी माय ॥ यह गति नाहीं क्यहु ठाकुरकी डोला आजु लेय निकराय २९ जितनी फौजें चन्देले की सो सब साथ हमारे भाय ॥ हमरो तुम्हरो मुर्च्चा द्वै है साँची सुनो कनौजीराय ३० यामें संशय कछु परि है ना तुमते ठीक दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें जगनायक की बोला तुरत बनाफरराय ३१ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है भैने सुनो चँदेलेकेर ॥ रतीभान के ये लरिका हैं नाती बेनचकवै केर ३२ घाट बयालिस पिरथी रोंके तब तुम गये हमारे पास ॥ बन्दि छुड़ाई इन मोहबे की काटी तहाँ यमनकी पाश ३३ आजु कनौजी सब लायक हैं हमरे माननीय शिरताज ॥ तुमहूँ प्यारे जगनायक जी विग्रहकेर नहीं कछुकाज ३४

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