भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 601

६ आल्हाखण्ड । ६०० देखिकै डोला लाखनिराना तुरतै कूचदीन करवाय ॥ चलिभा डोला जब फाटकते पहुँचा तुरत बजारे आय ४७ ऊदन बोले तब लाखनि ते मानो कही कन्नौजीराय ॥ कऊ दुसरिहा अब तुम्हरो ना डोला आप देउ लौटाय ४८ कीरति गैहैं सब दुनिया मा ओ महराज कन्नौजीराय ॥ इतना सुनिकै लाखनिराना डोला तुरत दीन लौटाय ४६ आयग तिसहिन ते तुरतै तब यहु महराज पिथौराशाय ॥ सुनी हकीकति सबलाखनिकी हाथी तुरत लीन सजवाय ५० आदिभयङ्कर के ऊपर चढ़ि बैठ्यो शम्भु शिवाक्रोध्याय ॥ चौंड़ा धाँधू अगल बगलभे डंका तुरत दीन बजवाय ५१ बाजत डंका अह्तंका के राजन कूच दीनकरवाय ॥ भारी लस्कर महाराजा का पहुँचा समरभूमि में जाय ५२ यहु महाराजा तब गाजाअति राजा गहरूदीन ललकार ॥ मारो मारो ओ रजपूतो हमरे समरशूर सरदार ५३ जान न पावैं मोहबेवाले अब शिरकाटि देउ भुइँडारि ॥ गरूई गाजैं सुनि राजाकी बाजैं घूमि घूमि तलवारि ५४ मारे मारे तलवारिन के नदिया बही रक्तकी लाल ॥ भरि भरि खप्पर नचैं योगिनी मज्जैं भूत प्रेत बैताल ५५ श्वान शृगालन की बनिआई कागन लागी कारि बजार ॥ गिद्ध औ चील्हनके झुण्डनका मुण्डन उपर लाग दरबार ५६ बहैं लहाशैं तहँ मनइन की तापर चढ़े काग औ कङ्क ॥ उठिउठिलड़ि २ गिरि २ कितन्यो मरिगे समर राव औ रङ्क ५७ घोड़ बेंदुला का चढ़वैया ठाकुर उदयसिंह निरशंक ॥ मारति आवै रजपूतन को लीन्हे सङ्ग सिपाही बङ्क ५८