आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंचन्दनखम्भाकामदान । १९०२ तारागण सब चमकन लागे संतन धुनी दीन परचाय ॥ आशिर्वाद देउँ मुंशी सुत जीवो प्रागनारायणभाय ८३ रहै समुन्दर में जबलों जल जबलों रहैं चन्द औ सूर ॥ मालिक ललितेके तबलों तुम यशसों रहौ सदाभरपूर ८४ माथ नवावों पितु माता को जिन बल पूरिसई यह गाथ ॥ तुम्हीं गोसइयाँ दीनबन्धु हौ स्वामी रामचन्द्र रघुनाथ ८५ माथ तुम्हारो है दुनिया मा दूसर नहीं हमारो नाथ ॥ सत्य शपथ यह धर्म कर्म की स्वामी दीनबन्धु रघुनाथ ८६ सुमिरि भवानी शिवशंकर को ह्याँते करों तरंग को अन्त ॥ राम रमामिलि दर्शन देवैं इच्छा यही भवानीकन्त ८७ इति श्रीलखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशीनवलकिशोरात्मजबाबू प्रयागनारायण- जीकीआज्ञानुसार उन्नामप्रदेशान्तर्गत पँड़रीकलांनिवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशङ्करसूनु पण्डितललिताप्रसादकृतचन्दनखम्भयुद्ध वर्णनोनामप्रथमस्तरंगः १ ॥ चन्दनखम्भाकामैदान समाप्त ॥ इति ॥