भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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पृष्ठ 603

८ आल्हखण्ड । ६०२ फिरि फिरि मारैं औ ललकारैं दोऊ बड़े लड़ैता ज्वान ॥ ऊंचे खाले कायर भागे छोड़िकै समर भूमि मैदान ७१ शूर सिपाही ईजति वाले आली खानदान के ज्वान ॥ बढ़ि बढ़ि मारैं तलवारी सों अपने धरे गदोरी प्रान ७२ आदि भयङ्कर को चढ़वैया यहु महराज पिथौराराय ॥ चौड़ा धाँधू को ललकारा चन्दन तुरत लेउ उल्टाय ७३ जान न पावैं मोहवे वाले सबकी कटा देउ करवाय ॥ सुनिकै बातें महाराजा की बोला तहाँ बनाफरराय ७४ तुम्हें मुनासिब यह नाहीं है ओ महराज बीर चौहान ॥ जैसे नौकर चन्देले के तैसे आप करो परमान ७५ नहीं बरोबरि कोउ तुम्हरे है ज्यहिपर आप चढ़े महराज ॥ बेला बेला दुहुँ तरफाते ज्यहिते भये दुःखके साज ७६ हमें पठायो है बेलाने चन्दन लेन हेतु महराज ॥ पहिले बगिया को कटवायो पाछे कीन भयङ्कर काज ७७ सची होई चंदेले सँग राखी दुहूँ कुल न की लाज ॥ हम समुझावा भल बेला को की तुम करो मोहोबे राज ७८ अनरथ भायो मन बेला के खम्भन हेतु दीन पठशाय ॥ ना चढ़िआये जयचँद राजा ना चढ़िये चँदेलेराय ७६ तुम्हें मुनासिब अब याही है राजन कूच देउ करवाय ॥ इतना सुनिकै महाराजा तहँ हाथी तुरत लीन लौटाय ८० भाग्यो लश्कर फिरि पिरथी का सबदलतितिर बितिर है जाय ॥ लादि कै खम्भा तहँ छकरन में लाखनि कूचदीनकरवाय ८१ पार उतरि कै श्री यमुना के तम्बुन फेरि पहुंचे आय ॥ खेतलूटिगा दिननायक सों झंडागड़ा निशाकोआय ८२