भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

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बेलासती अन्त मैदान । ६१३ ऊदन बोले तब चौंड़ा ते मानो कही चौंड़ियाराय ८२ मरिगे लाखनि जो मोर्चा में तौ नहिं जियैं बनाफरराय ॥ बिना इकेले लखराना के मरिहैं कौन साथक्यहि आय ८३ मित्र कनौजी अस मरिगे जब जीहै कौन समर तब भाय ॥ मारु चौंड़िया अब जल्दी सों हमरो शोक मोख मिटिजाय ८४ इतना कहिकै उदयसिंह ने तुरतैं खैंचिलीन तलवार ॥ ऐंड़ लगावा रसबेंदुल के हौदा उपर गयो त्यहिवार ८५ काटि महावत औ हाथी को आपन शीश दीन पकराय ॥ काटि शीश तब चौंड़ा लीन्ह्यो औ धड़ गिरा धरणिमें आय ८६ ऊदन देवा जगनायक जी सब कोउ मरे समर में आय ॥ चौंड़ा पिरथी आल्हा इन्द्दल रहिगे शेष चारि ये भाय ८७ ऊदन जूझे समरभूमि में आल्हा चले तड़ाका धाय ॥ देवी शारदा का वरदानी अम्मर कहै लोक सब गाय ८८ सुना बनाफर जब कानन ते की मरिगये लहुरवा भाय ॥ पकरि बनाफर तब चौंड़ा को मर्दन कीन देह में लाय ८६ मींजि माँजिकै त्यहि चौंड़ाको आगे हाथी दीन बढ़ाय ॥ आदिभयङ्कर जहँ ठाढ़ो थो आल्हा तहाँ पहूंचे जाय ६० पकरिकै बाहू तहँ पिरथी की आल्हा बाँधिलीनत्यहिठायँ ॥ नील डरायो नृप आँखिन में बंधन तुरत दीन छुड़वाय ६१ खबरि मोहोबे औ दिल्ली गै की रण बचे तीन जन भाय ॥ आल्हा इन्द्दल पिरथी राजा और न चौथकउदिखलाय ६२ सुनवाँ फुलवा द्यावलि माता सुनतै चलीं तड़ाकाधाय ॥ सुनवाँ बोली समर भूमि में आल्हा डार्यो बन्धु मराय ६३ आल्हा मुखते सुनि सुनवाँ के मनमा ठीक लीन ठहराय ॥