आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें१० आल्हखण्ड । ६१४ धर्म न रहै क्यहु कलियुगमा सब बिन धर्म जगतह्वैजाय ६४ यहै सोचिकै आल्हा ठाकुर इन्दल बोले बचन सुनाय ॥ माता तुम्हरी नाम हमारो लीन्ह्यो सुनो बनाफरराय ६५ दुर्गति होई अब कलियुग मा ताते देयँ पूत बतलाय ॥ करो तयारी बन कजरी की अपनो मया मोह बिसराय ६६ इतना कहिकै आल्हा ठाकुर हाथी चढ़े तड़ाका धाय ॥ इन्दल बैठे फिरि घोड़े पर साथै कूच दीन करवाय ६७ इन्दल इन्दल कै गुहरायो सुनवाँ चली पछारी धाय ॥ पूँछ पकरिकै पचशब्दा कै सुनवाँ गजैघसीटतिजाय ६८ ऐंचि खड्ग को आल्हा ठाकुर तुरतै दीन्ह्यो पूँछ गिराय ॥ बिना पूँछ का पचशब्दा फिरि कजरी बनै पहूँचा जाय ६६ रही न आशा क्यहु जीवनकी सबहिन दीन्ही देहजराय ॥ प्राण आपने नारी तजि कै सुरपुर गईं तड़ाका धाय १०० सुनवाँ फुलवा चित्तररेखा व्यावुलिसहित मरींसबआय ॥ मोहबा दिल्ली दुउ शहरन में राँड़न झुंडभये अधिकाय १०१ छाय उदासी गै दोऊ दिशि बिपदा कही बूत ना जाय ॥ रानी मल्हना मोहबे वाली मनमासोचिसोचिरहिजाय १०२ तुम्हें विधाता अस चाही ना जैसी बिपति दीन अधिकाय ॥ दुःखित ह्वैकै महरानी फिरि पारस पत्थर लीन उठाय १०३ जाय सिरायो सो सागर में चन्दन अक्षत फूल चढ़ाय ॥ धूप दीप औ कीन आरती मेवा मिश्री भोग लगाय १०४ हवन ब्राह्मण को भोजन दै बोली हाथ जोरि शिरनाय ॥ जो कोउ राजा हो मोहवे में पारस रह्यो तासु घरआय १०५ इतना कहिकै रानी मल्हना महलन फेरि पहूँची आय ॥