आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ५७ ६ की खपरी खपरिन मिलि जैहैं की पै मिली बाप का दाउँ ॥ जो नहिं जावों गढ़माड़ो को ऊदन नाहिं कहावों नाउँ ८० मलखे बोले तब देवा ते हमको शकुन देउ बतलाय ॥ हारि हमारी माड़ो हैहै की हम जितब करिंगाराय ८१ लैकेँ पोथी समरसार की देवा शकुन विचारन लाग ॥ यजुर्वेद ऋगवेद अथर्वण जानै सामवेद बड़भाग ८२ शकुन हमारो यों बोलत है माड़ो काम सिद्धि हैजाय ॥ मूड़ मुड़ावो योगी हैकै माड़ो चलो सबै जनभाय ८३ सुनिकै बातें ये देवा की मलखे थान लीन मँगवाय ॥ रंग रँगायो ते गेरू के गुदड़ीतुरतलीन सिलवाय ८४ वइसपर्त की सिली गुदड़ियाँ जिनमें छिपैं ढाल तलवार ॥ आल्हा ऊदन मलखे देवा सय्यद बनरस का सरदार ८५ पांचों मिलिकै सम्मत कैकै योगी भेष लिह्यनि फिरिधार ॥ कड़ा सूबरण के हाथे मा कानन कुंडल करैं बहार ८६ हाथ सुमिरनी तुलसी वाली तनमा लीन्ह्यो भस्म रमाय ॥ मलखे लीन्ह्यो इकतारा को आल्हा डमरू लियो उठाय ८७ लीन सरंगी मीराताल्हन देवा खँजड़ी रहा बजाय ॥ बजै बँसुरिया बघऊदन की शोभा कही बूत ना जाय ८८ राग छतीसो गावन लागे एक ते एक शूर सरदार ॥ सुरति बिहागर जयजयवन्ती ठुमरी टप्पा और मलार ८६ धुरपद गावैं औ तिल्लाना तोरैं ग़ज़ल पर्ज पर तान ॥ भूमि भूमिकै सारँग गावैं करिकै रामचन्द्र को ध्यान ६० मलखे बोले तब ऊदन ते तुम सुनि लेउ बनाफरराय ॥ पहिले माता द्वारे चलिये तहँपर अलख जगावँ जाय ६१