भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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१० | आल्हाखण्ड । ५८ पाछे चलिये गढ़माड़ो को जामें काम सिद्ध है जाय ॥ सम्मत कैकै पाँचो योगी ड्योढ़ी उपर पहुंचे आय ६२ रानी द्यावलि के द्वारेपर योगिन अलख जगायोजाय॥ बाँदी दौरीं तब महलन ते द्वारे तुरत पहुंचीं आय ६३ देखि तमाशा यहु द्वारेपर महलन अटीं तड़ाका धाय ॥ हाल बतायो सब योगिन का सोऊ गई द्वारपर आय ६४ रूप देखिकै सब योगिन को द्यावलि खुशी भई अधिकाय ॥ पूँछन लागी फिरि योगिन ते योगी सत्य देव बतलाय ६५ कौन देश ते तुम आयो है जावो कौन देश महराज ॥ जो कछु माँगो म्वरे महलन में पुरवों तौन तुम्हारो काज ६६ इतनी सुनिकै ऊदन बोले माता बचन करो ममकान ॥ धोखे योगी के भूलो ना अपनोपुत्र मोहिं तू जान ६७ सुनिकै बातें ये ऊदन की द्यावलि बड़ी खुशी है जाय ॥ हृदय लगायो सब लरिकनको आशिर्वाद दीन हर्षाय ६८ ऊदन बोले फिरि माता ते हमरे बचन करो परमान ॥ ड्योढ़ी माँगिहौं रनिकुशलाकी नापहिचनी करिंगा ज्वान ६६ धरि दे पंजा म्वरि पीठि मा माड़ो लेउँ बापका दायँ ॥ सुनिकै बातें ये ऊदन की द्यावलि गोदलीन बैठाय १०० भुजबल पूज्यो सब लरिकनके द्यावलि बार बार बलिजाय ॥ जितिहौ राजा माड़ोवाला तुम्हरो वारु न बांका जाय १०१ सुनिकै बातें सब द्यावलि की चारों धरयो चरणपर माथ ॥ बड़ी अनन्दित द्यावलि द्वैकै फेरा सबन पीठि पर हाथ १०२ विदा मांगिकै सब माताओं मनिया देवन गे हर्षाय ॥ बड़ा प्रतापी जो मोहवेमाँ अस्तुति पढ़न लाग शिरनाय १०३