आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ५६ ११ सवैया ॥ जय जय देव मनावत तोहिं औ ध्यावतहउँ मैं गरीवनिवाजा । बदला पितुकोज्यहिभांति मिलै सोकरो बिभुदेवनहोय अकाजा ॥ भक्ततुम्हार उदयसिंह ठाढ़ सो आयसु काह मिलय महराजा । यहिभांति अनेकनबारकह्योशिरनायरह्यो ललितेनिजकाजा १०४ अस्तुति कीन्ह्यो मलखाने ने देबा ज्वरे खड़ा दोउहाथ ॥ पूजा कीन्ह्यो भल आल्हाने पाछे धरा चरणपर माथ १०५ मन्दिर बाहर सैयद ठाढ़ो सोऊ ध्यायरहा मनमांझ ॥ चरि चरि गौवें घरका डगरीं औ द्वैगई तहांपर सांझ १०६ उड़ि उड़ि पक्षी गये बसेरन नखतन कीन तहाँ उजियार ॥ पूजाकरिकै सब बिधिवतसों तहँते चलत भये सरदार १०७ जायकै पहुंचे निज महलन में नयनन गई नींद अतिछाय ॥ मलखे देबा आल्हा ऊदन सोये रामचन्द्र को ध्याय १०८ सैयद सुमिरयो बिसमिल्ला को नाहर बनरस का सरदार ॥ बिकट निशाकी ये बातें हैं ज्वानो मानो कही हमार १०६ योगी जागैं सब आनंद सों चोरन बड़ी खुशी भै आय ॥ माथ नवावों श्रीगणेश को औ रट राम राम मनलाय ११० दोउ पद बन्दौं पितु अपने के जिन मोहिं विद्या दीनपढ़ाय ॥ स्वर्ग में बैठे सो सुख भोगैं सेवक कहै नित्त यशगाय १११ सब अभिलाषा पूरी हैगै आशा रही राम के पाँय ॥ आगे फौजें मोहबे सजिहैं माड़ो जई बनाफरराय ११२ इतिश्री लखनऊनवासि (सी,आई,ई) मुंशी नवलकिशोरात्मज बाबू प्रयागनारायणजीकी आज्ञानुसारउन्नावप्रदेशान्तर्गत पँडरीकलां निवासि मिश्रवंशोद्भव बुधकृपाशंकरसूनु पं०ललिताप्रसादकृत ऊदनमातासंवादेप्रथमस्तरङ्गः १ ॥