आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंमाड़ोका युद्ध । ७३ २५ सीढ़िन सीढ़िन सों ऊपर गे पहुँचे रंगमहल में जाय ॥ खिरकी लागीं मलयागिरि की शोभा कही बूत ना जाय १४१ बैठि कबूतर हैं छज्जा पर कहुँ कहुँ नाचिरहे हैं मोर ॥ सुवा पहाड़ी कहुँ पिंजरनमाँ मैना बोलि रहे अतिजोर १४२ राजा जम्बा की महरानी खिरकिन परदा दीन डराय ॥ पतले कपड़ा के परदा हैं योगी तासों परैं दिखाय १४३ चढ़ाउतारू भुजदण्डैं हैं जिनका सिंहवरण करिहायँ ॥ छाती चौड़ीहै योगिनकै नैनन रही लालरी छाय १४४ रूप देखिकै तिन योगिन का रानी गई सनाका खाय ॥ डाटन लागी तब बाँदी को बाँदी काह गई बौराय १४५ ऐसे योगी हम दीखे ना ये कोउ राजन केर कुमार ॥ तुइ छल कीन्हे म्वरे साथमाँ बाँदी पेट फरैहौं त्वार १४६ योगी बोले तब रानीते रानी भर्म देउ सब छाँड़ ॥ बाप हमारे बारे मरिगे माता बरी बैस भै राँड़ १४७ देश हमारे सूखा परिगा माता ब्यँचा योगिन के हाथ॥ रूप बिधाता हमका दीन्ह्यो पै हम भजैं सदारघुनाथ १४८ इतनी सुनिकै रानी बोली ओ योगिनके राजकुमार ! कहाँते आयो औ कहँ जैहौ कहँ है देश रावरे क्यार १४६ कड़ा सूबरण के क्यहि दीन्हे गुदड़ी कौन दीन बनवाइ ॥ सुनिकै बातें ये रानी की मलखे बोले बचन बनाय १५० देश हमारो बंगालो है औ हम हिंगलाजको जायँ ॥ राजा जयचँद कनउज वाला ड्योढ़ी मँगी तासुकीमाय १५१ मोहित ह्वैगा सो योगिनपर गुदड़ी तुरत दीन बनवाइ ॥ कड़ा सूबरण के अपने कर योगिन स्वईदीन पहिराय १५२