भारतकोश
आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)

Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik

महाकवि जगनिक द्वारा

DevanagariHindipublished618 पृष्ठ

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माड़ोका युद्ध । ७७ २६ पूँछन लागी तब बेटी ते काहे बदन गयो कुँभिलाय २३ रूप देखिकै इन योगिन का उरमें गई दया फिरि आय ॥ मात पिता बारे ते मरिगे तब इन डारे मूड़ मुड़ाय २४ ठाढ़े सोचों मैं मनमें यह तबलों पाँव रपटिगा माय ॥ डारि तमाखू बीरा लायूं ताते योगी गिरा भहराय २५ पाप न लावो कछु मन अपने माता सत्य दीन बतलाय ॥ सुनिकै बातें ये बिटिया की मनमाूसत्य समझिगैमाय २६ रानी बोली फिरि योगिन ते अब तुम करो तमाशा भाय ॥ सुनिकै बातें ये रानी की नाचन लाग लखुरवाभाय २७ गावन लागे मलखाने तब धुरपद सरंगीत औ ख्याल ॥ धनि धनि माता इनकी कहिये ऐसा कहन लगीं सबबाल २८ एकते दूसरी बोलन लागी हमरी सुनो सखी तुम बात ॥ बालम हमरे जो ये होवैं ऐसो बिधी बनावै नात २९ बैठि बिजनिया इनके ढोरैं मुख में सखी खवावैं पान ॥ सुफल जन्म आपन हम मानैं मानो सखी बचन परमान ३० तीसरि बोली फिरि आली सों आली करो बचन ममकान ॥ रूप उजागर सब गुणआगर योगीसकलगुणनिकेखान ३१ हमहूँ मोहिन इन योगिन पर मानो सखी बचन तुम साँच ॥ धड़कै आली म्वरि छाती अब औजरिहिनबिरहकीआँच३२ चौथी बोली का तुम बोलो हमरे लगे करेजे बान ॥ तीखे नैना हैं योगिन के मानो अबै उतारे शान ३३ पँचयीं बोली का तुम बोलो सखियो सबै गइउ बौराय ॥ कबहुँक पावैं हम पलँगा पर तौ बैकुण्ठ धामको जायँ ३४ छठयीं बोली फिरि सखियन सों हमनिज जियकी देयँबताय ॥