आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३० आल्हखण्ड । ७८ हम सुखपावैं इन योगिन सँग चाहौ भीख मागिकै खायँ ३५ सतयीं बोली का तुम बोलो जो यह लिखा होत कर्त्तार ॥ हमहूं होइत क्यहु योगी घर तब ये होते मोरि भतार ३६ अठयीं बोली का तुम बोलो याही लिखा रहै कर्त्तार ॥ नैनन देखै मन सों मोहै ताको जानो पूर भतार ३७ नवयीं बोली का तुम बोलो तुम्हरे खाउँ पूत औ भाय ॥ तुम्हरे सबके ई पति होवैं हमका कौन दई लैजाय ३८ दशयीं बोली तब रिस करिकै राँड़ो अबना करो चवाउ ॥ देखो तमाशा तुम योगिन का बातन काह घरे लैजाउ ३६ सुनिकै बातैं त्यहि दशयीं की सखियां सबै गईं शरमाय ॥ जितनी नारी गढ़माड़ो की सो योगिन पर गईं लुभाय ४० दिह्यो रुपैया केहु योगिन का केहू दीन मोतिन का हार ॥ रानी कुशला वैरागिन को तुरतै दीन नौलखाहार ४१ चलिभे योगी तब महलन ते फाटक ऊपर पहुँचे जाय ॥ बेटी बिजैसिनि तहँ जल्दी सों ऊदन पास पहुँची आय ४२ पकरिकै बाहू दोउ ऊदन की औ यह बोली बचन सुनाय ॥ मैं पहिचानति त्वाहिं ऊदन है नाहक डारयो मूड़ मुड़ाय ४३ योगीके बालक तुम आहिवना आहिव देशराज के लाल ॥ जल्दी चलिदे अन्वरे महलन में नाहीं तोर पहुँचा काल ४४ सुनी बिजैसिनि की ई बातें बोला तुरत लहुरखा भाय ॥ कहँना दीख्यो तुम ऊदन का साँचे हाल देउ बतलाय ४५ सुनिकै बातें बघऊदन की बोली तुरत बिजैसिनि बैन ॥ अभई लड़का जो माहिल का देखा तासु ब्याह में नैन ४६ हमहूं न्याते गईं सिरउँज माँ तहँ तुम गये बराती भाय ॥