आल्हा-खण्ड / परमाल रासो (महाकवि जगनिक - ५२ लड़ाइयों का ऐतिहासिक वीरगाथा महाकाव्य)
Alha-Khand (Parmal Raso) of Mahakavi Jagnik
महाकवि जगनिक द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें३४ आल्हाखण्ड । ८२ जैसी रागिनी मलखेगावैं देवा तैसे देय बजाय ८३ बजै बँसुरिया भल ऊदनकी थेई थेई रहे मचाय ॥ ताताथेई ताताथेई मुखसों बोलैं अँगुरिन भावबतावतजायँ ८४ सवैया ॥ मोहिगयो माड़व शिरताज सो राजके काज सबै विसराये । तानके वान नथा करिया अरिऊपर चित्तको सोउ लुभाये ॥ होनी चहै सो होन भलीविधि ज्ञान औ बुद्धि न होत सहाये । तानके वानलगै मलखानके ज्वानगिरैं ललिते मुरझाये ८५ रय्यति मोही सब माड़ो की मोहे बाल वृद्ध औ ज्वान ॥ राजा बोला तब माड़व का योगिउ वचनकरो परमान८६ लाखापातुरि म्वरे महलन में ताकी तानसुनी हम भाय ॥ की हम मोहे त्वरि तानन में योगी सत्य दीन बतलाय८७ सुनिकै बातें महाराजा की तुरतै ब्वला लहुरवा भाय ॥ तुम बुलवावो त्यहि पातुरिको हमको तान सुनावैआय ८८ हुकुम लगायो महाराजा ने लाखा तुरत पहुंची आय ॥ तबला गमके ब्रजवासिनि के औध्वनिगई मंजीरनछाय ८६ लिह्यो सरंगी को भँडुवा तब लाखानचनलागि त्यहिठायाँ ॥ को गति वरणै तब लाखाकै हमरे बूत कही ना जाय ६० जब दिशिआई वह योगिन के तब फिरि ब्वलालहुरवाभाया। हुकुम जो पावै हमे दादा को याको हार देयँ पहिराय ६१ आल्हा बोले तब ऊदनते भैया मानो कही हमार॥ पहिरे देखी जम्बैराजा लाखा गले नौलखाहार ६२ मूड कटाई सब योगिन के भैया काहगयो बौराय ॥ कही न मानी सो आल्हाकी ताको हार दीन पहिराय ६३