अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३० ] अमृतोद्दीपिनी विद्या निरपाया निरंजना । अमनस्का कला कापि जयत्यानन्ददायिनी ॥ २१ ॥ यह अमनस्का विद्या अमरता को उद्दीप्त करनेवाली, कभी विनष्ट न होने- वाली और किसी भी प्रकार के कालुष्य से रहित है । यह आनन्दप्रदायिका लोकोत्तर कला सबसे उत्कृष्ट होने के कारण सर्ववन्दनीय है ॥ २१ ॥ प्राणाष्टोच्छ्वासनिःश्वासविध्वस्तविषयग्रहः । निश्चेष्टो निर्गतारम्भोह्यानन्द एव योगिनः ॥ २२ ॥ प्राण वायु के आठ उच्छ्वास और निःश्वासों से जिसमें रूप आदि विषयों का ग्रहण नहीं होता, जिसमें हस्त, पाद आदि अंगों की चेष्टाएँ नहीं होतीं अर्थात् निश्चलतायुक्त एवं किसी प्रकार का कार्यारम्भ जिसमें नहीं होता अर्थात् निष्क्रियता सम्पन्न आनन्द ही योगी का है ॥ २२ ॥ उच्छिन्नसर्वसंकल्पो निश्शेषाशेषचेष्टितः । स्वावगम्यो लयः कोऽपि जगतां वागगोचरः ॥ २३ ॥ जिसमें सब प्रकार के संकल्प छिन्न-भिन्न हो चुके हैं, सब चेष्टाएँ निःशेष गई हैं, केवल अपने अनुभव से ज्ञेय कोई अद्भुत लय लोगों की वाणी अगोचर है, उसका वाणी द्वारा प्रतिपादन नहीं किया जा सकता ॥२३॥ वदन्त्येव परं ब्रह्म बुद्धिमन्तो हि सूरयः । सर्वबोधकलालापकुशला दुर्लभा भुवि ॥ २४ ॥ बुद्धिमान् विद्वान् पुरुष परम ब्रह्म को वाणी से कहते भर हैं सबको बोध ( ज्ञान ) कराने की कला के आलाप में कुशल पुरुष पृथ्वी में दुर्लभ हैं । या सब बोधकलाओं ( ज्ञान कलाओं ) के उपदेश में कुशल पुरुष पृथ्वी पर दुर्लभ हैं ॥ २४ ॥ विन्दन्त्यनात्मनोऽभावं वेदान्तोपनिषद्विदः । रहस्यमुपदिश्यापि स्वयं नानुभवन्ति ते ॥ २५ ॥ वेदान्त उपनिषदों के मर्मज्ञ अनात्मा के अभाव को तत्त्व जानते हैं । वे उसका उपदेश देते हैं पर स्वयं उसका अनुभव नहीं करते हैं ॥ २५ ॥