अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ३१ ] विज्ञाय योगशास्त्राणि नानागुरुमतानि च । निबद्धः स्वावबोधो यं सद्यः प्रत्ययकारकः ॥ २६ ॥ विविध योगशास्त्रों का तत्त्व भलीभाँति जानकर तथा नाना गुरुजनों के मतों को भी भली प्रकार जानकर यह अमनस्क नामक स्वावबोध (आत्म- बोध) रचा गया है । यह सद्यः ज्ञानकारक है ॥ २६ ॥ सकलं समनस्कं च सापायं च सदा त्यज । निष्कलं निर्मनस्कं च निरायासं सदा भज ॥ २७ ॥ समनस्क जो सकल ( प्राणादि नामान्त कलाओं से युक्त ) और विनश्वर है, का सदा त्याग करो और निर्मनस्क ( अमनस्क ), जो [कलारहित और आयासविहीन है१, का सदा सेवन करो ॥ २७ ॥ दुग्धाम्बुवत् संमिलितौ तुल्यक्रियौ मानसमारुतौ च । यावन्मनस्तत्र मरुत्प्रवृत्तिर्यावन्मरुच्चापि मनः प्रवृत्तिः ॥२८॥२ मन और वायु दूध और जल की तरह परस्पर मिले हुए हैं उन दोनों की क्रिया भी एक सी ही है । उन दोनों में जब तक मन • रहेगा तब तक वायु की प्रवृत्ति भी रहेगी और जबतक वायु रहेगा तब तक मन की भी प्रवृत्ति रहेगी ॥ २८ ॥ तत्रैकनाशादपरस्य नाशः एकप्रवृत्तेरपरप्रवृत्तिः । अभ्यस्तयोरिन्द्रिय३ वर्गवृद्धिर्विध्वस्तयोर्मोक्षपदस्य सिद्धिः॥२९॥ उन दोनों में एक के विनाश से दूसरे का विनाश हो जाता है और एक की प्रवृत्ति से दूसरे की प्रवृत्ति होती है। उन दोनों के प्रवृत्त होने पर इन्द्रियवर्ग की वृद्धि ( रूप, शब्द, गन्ध, रस, स्पर्श आदि की ओर अधिक आकर्षण ) होती है और उनके विध्वस्त होने पर मुक्ति प्राप्त होती है ॥ २९ ॥ १. 'निरपायम्' ऐसा पाठ मानने पर 'अविनाशी है' । यह अर्थ होगा । २. चले वाते चले चित्तं निश्चले निश्चलं भवेत् ॥ (हठयोगप्रदीपिका२।२) ३. अभ्यस्तयोस्तत्र त्रिवर्गवृद्धिः इतिपाठः समीचीनः प्रतिभाति । अर्थात् मन और वायु के अभ्यस्त होने पर त्रिवर्ग-धर्म, अर्थ और काम की वृद्धि होती है ।