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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ३२ ] तत्राप्य१साध्यः पवनस्य नाशः षडंगयोगादिनिषेवणेन । मनोविनाशस्तु गुरुप्रसादा- न्निमेषमात्रेण सुसाध्य एव ॥३०॥ उन दोनों में वायु का विनाश षडंग-योग आदि के कौशलके साथ सेवन से साध्य है और मन का विनाश तो श्री गुरुदेव के अनुग्रह से एक पलभर में ही सुसाध्य होता है ॥ ३० ॥ तस्मान्मनोनाशवतोऽमनस्कता यन्नाशतो नश्यति वायुरग्रे । तस्मात्सुबुद्धीन्द्रियदेहनाशा- दद्वैतबुद्धिः सहजस्थितस्य ॥३१॥ इसलिए जिसके मन का विनाश हो चुका उसे अमनस्कता ( अमनस्क योग ) प्राप्त है । मन के नाश के पहले वायु विनष्ट हो जाता है । वायु और मन के विनाश से बुद्धि, इन्द्रिय और देह का विनाश होने के कारण अमनस्क योगी को (सहजतत्त्व में स्थित योगी को) अद्वैतबुद्धि होती है ॥३१॥ जित्वा वायुं विविधकरणैः क्लेशमूलैः कथंचित्, कृत्वा यत्नं निजतनुगताशेषनाडीप्रचारान् । अश्रद्धेयां परपुरगतिं साधयित्वापि नूनम्, विज्ञानेऽपि व्यसनसुखिनो नास्ति तत्त्वस्यसिद्धिः ॥३२॥ कष्टकारी विविध साधनों से किसी प्रकार कठिनाई से वायु पर विजय प्राप्त कर और उसका प्रयत्नपूर्वक अपने शरीर की सम्पूर्ण नाडियों से संचार कर, अश्रद्धेय ( अविश्वसनीय ) परकायप्रवेश को असंदिग्ध रूप से सिद्ध कर विज्ञान में व्यसन से सुख माननेवाले भी अर्थात् विज्ञानार्जन में अत्यन्त परिश्रमशील साधक को तत्त्व की सिद्धि नहीं होती है ॥ ३२ ॥ १. थ।