भारतकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ३३ ] केचिन्मूत्रं पिवन्ति स्वमलमथ तनौ केचिदुज्झन्ति लालां केचित्काष्ठां प्रविष्टा युवतिभगगतं विन्दुमूद्ध्र्वं नयन्ति। केचित्खादन्ति धातून् अखिलतनुशिरावायुसंचारदक्षा- नैतेषां देहसिद्धिर्विगतनिजमनोराजयोगादृते स्यात् ॥ ३३ ॥ कुछ अघोरपंथी अपना मूत्र पीते हैं, कोई अपना मल ग्रहण करते हैं, कोई अपने शरीर पर राख पोतते हैं, दुराचरण की पराकाष्ठा को प्राप्त हुए कोई युवती जनों के गुह्यांग की बूंदों को ऊपर खींचते हैं, कोई विविध प्रकार की धातुओं (रसों) का सेवन करते हैं और कोई शरीर की समस्त नाड़ियों में वायु का संचार करने में निपुण हैं परन्तु इन सबको कार्यसिद्धि प्राप्त नहीं होती । कार्यसिद्धि का अमनस्क ( जिससे अपना मन विलोन हो गया ऐसे ) राजयोग के सिवा दूसरा साधन नहीं है ॥ ३३ ॥ केचित्तर्कवितर्ककर्कशधियोऽहंकारदर्पोद्धताः केचिज्जातिगताभिमानभरिता ध्यानादिकर्माकुलाः । प्रायः प्राणिगणा विमूढमनसो नानाविकारान्विता दृश्यन्ते नहि निर्विकारसहजानन्दैकभोगाकुलाः ॥३४॥ नाना तर्कों के ऊहापोह से कर्कश बुद्धिवाले कोई लोग निविड़ अहंकार से उद्धत रहते हैं एवं कोई जातिगत अभिमानान्वित होकर ध्यान आदि कर्मों में व्यग्र रहते हैं । पृथ्वी पर प्रायः सभी प्राणी मूढमन ( विकृत मस्तिष्क ) हैं तथा नाना प्रकार की विकृतियों से युक्त हैं । एकमात्र निर्विकार सहजानन्द का उपभोग करनेवाले कोई नहीं दिखाई देते हैं ॥३४॥ एकदण्डत्रिदण्डादि जटाभस्मादिकं तथा । केशमुंचननग्नत्वे रक्तचीवर धारणम् ॥३५॥ उन्मत्ततामभोज्यान्नपानं पाखण्डवृत्तितः । इत्यादिर्लिंगग्रहणं नानादर्शनदर्शनम् ॥३६॥ कोई एक दण्डधारी हैं तो कोई त्रिदण्ड आदि धारण करनेवाले हैं, कोई जटाधारी हैं तो कोई सर्वाङ्ग में खूब भभूत रमाये हुए हैं, कोई मुण्डित-मस्तक ३