अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ५० ] यदा यदा सदाभ्यासात् संकल्पविलयो भवेत् । योगिनो भवति श्रेयान् कर्मत्यागस्तदा तदा ॥ १०६ ॥ जब जब सदा अभ्यास से संकल्प का विनाश होता है तब तब योगी का न्त श्रेयान् कर्मत्याग होता है ॥ १०६ ॥ दान्तानां कुशलानां च सततं मोक्षमिच्छताम् । श्रद्धावतां सुशिष्याणां शास्त्रमेतत्प्रकाशयेत् ॥ १०७ ॥ इन्द्रियों पर विजय प्राप्त कर चुके एवं सदा मोक्ष की इच्छा रखनेवाले दक्ष श्रद्धावान् सत् शिष्यों के लिए इस शास्त्र को प्रकट करना चाहिये ॥१०७॥ शास्त्रमेतत् प्रयत्नेन सदाभ्यस्यं मुमुक्षुभिः । यस्य धारणामात्रेण स्वयं तत्त्वं प्रकाशते ॥ १०८ ॥ मुमुक्षु पुरुषों को इस शास्त्र का जतन से सदा अभ्यास करना चाहिये, जिसके धारणामात्र से तत्त्व अपने आप प्रकाश में आता है ॥ १०८ ॥ न दिवा जागरितव्यं स्वपितव्यं नैव रात्रिभागेऽपि । रात्रावह्नि च सहजे स्वपितव्यं योगिना नित्यम् ॥ १०९ ॥ योगी को न तो दिन में जागरण करना चाहिये और न रात्रि में शयन । योगी को नित्य रात में और दिन में सहजतत्त्व में शयन करना चाहिये ॥१०९॥ निर्मनः सहजस्थिते पुरुषे न दिवारात्रिशब्दोऽस्ति । जागरणशयनवर्जित चिन्मात्रानन्दस्थानात् ॥११०॥¹ अमनस्करूप सहजतत्त्व में स्थित पुरुष के विषय में दिन और रात्रि शब्द लागू नहीं होते हैं, क्योंकि वह जागरण और शयन से रहित चिन्मात्रानन्द में स्थित रहता है ॥ ११० ॥ ॐ कारप्रमुखैर्विचित्रकरणैः प्रायस्य वा यो जपः², तेजाश्चिन्तनमन्तरालकमले शून्याम्बरालम्बनम् । १. स्वप्नः प्रबोधो न च योगमुद्रा नक्तं दिवा वापि न मे कदाचित् । अतुर्यतुर्यं च कथं वदामि स्वरूपनिर्वाणमनामयोऽहम् ॥ ( अवधूतगीता ४-१७) २. 'प्राणस्ययोजनम्' इतिपाठान्तरम् ।