अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४६ ] उत्तुङ्ग सहजानन्दः सदाभ्यासरतः स्वयम्। सर्वसंकल्पसंत्यक्तः स विद्वान् कर्मसंत्यजेत् । १०१॥ स्वयं सदा अभ्यास में निरत अतएव बहुत उन्नत सहज आनन्दवाला तथा सब संकल्प और विकल्पों से मुक्त हुआ वह विद्वान् पुरुष कर्म का सम्यक् त्याग कर दे ॥ १०१ ॥ ये तु विद्यार्थविज्ञाना¹ विद्वांस इति कीर्तिताः। आत्मतत्त्वं न जानन्ति दर्वी पाकरसं यथा ॥१०२॥ किन्तु जो लोग पुस्तकीय विद्या और धनार्थ अर्जित विज्ञानवाले विद्वान् कहे जाते हैं वे आत्मतत्त्व को वैसे ही नहीं जानते हैं जैसे कि दर्वी ( करछुल) पाक ( रसोई ) के रस ( स्वाद ) को नहीं जानती ॥ १०२ ॥ सांसारिकक्रियायुक्तं ब्रह्मज्ञोऽस्मीति वादिनम्। कर्मब्रह्मोभयभ्रष्टं तं त्यजेदन्त्यजं यथा ॥१०३॥ जो सांसारिक क्रियाओं से युक्त हो और मैं 'ब्रह्मज्ञानी हूं' ऐसा दम भरता हो, कर्म और ब्रह्म दोनों से भ्रष्ट उस तथाकथित ब्रह्मज्ञानी का अन्त्यज के समान त्याग कर देना चाहिये ॥ १०३ ॥ वृथा देवान् परित्यज्य कर्मकाण्डविवर्जितान् । पाखण्डपण्डितान् मन्ये न ते किमपि जानते ॥ १०४ ॥ वृथा यजनीय देवताओं का परित्याग कर कर्मकाण्ड से रहित लोगों को मैं पाखण्डी पण्डित मानता हूँ । वे कुछ भी नहीं जानते हैं ॥ १०४ ॥ न कर्माणि त्यजेद् योगी कर्मभिस्त्यज्यते ह्यसौ । कर्मणो मूलभूतस्य संकल्पस्यैव नाशतः ॥ १०५ ॥ योगी को कर्मों का त्याग नहीं करना पड़ता है, क्योंकि कर्मों के मूलभूत संकल्प का नाश होने से वह स्वयं कर्मों द्वारा त्यागा जाता है ॥ १०५ ॥ १. 'विदितविज्ञाना' इति पाठान्तरम् । ४