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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ४८ ] विश्लिष्टं तामसं प्रोक्तं राजसं च गतागतम् । सुश्लिष्टं सात्त्विकं प्रोक्तं सुलीनं गुणवर्जितम् ॥ ६५ ॥ विश्लिष्टावस्था तामस कही गई है, गतागतावस्था राजस, सुश्लिष्टा- वस्था सात्त्विक और सुलीनावस्था निर्गुण कही गई है ॥ ६५ ॥ विश्लिष्टं च गतायातं विकल्पविषयग्रहम् । सुश्लिष्टं च सुलीनं च विकल्प विषनाशनम् ॥ ६६ ॥ विश्लिष्ट और गतागत अवस्था में विकल्प और विषयों का ग्रहण होता है। सुश्लिष्ट और सुलीन अवस्था में विकल्प रूपी विष का नाश हो जाता है ॥ ६६ ॥ ततोऽभ्यासनियोगेन निरालम्बो भवेद् यदि । तदा सरिसभूतानि (सहजभूतात्मा ?) परमानन्द एव सः ॥६७॥ तदुपरान्त निरन्तर अभ्यासयोग से यदि योगी निरालम्ब हो जाय तो उसका आत्मा सहजावस्था को प्राप्त करके परमानन्द ही बन जाता है ॥६७॥ १ अभ्यस्यतो मनःपूर्वं विश्लिष्टं चलमुच्यते । ततश्च निश्चलं किंचित् सानन्दं च गतागतम् ॥ ६८ ॥ सानन्दं निश्चलं चेतः ततः सुश्लिष्टमुच्यते । अतीव निश्चलीभूतं सानन्दं च सुलीनकम् ॥ ६६ ॥ अभ्यास कर रहे योगी का मन पहले चल रहने के कारण विश्लिष्ट कहा जाता है। उसके बाद किंचित् निश्चल होने पर सानन्द कहा जाता है। और अत्यन्त निश्चल हो जाने पर उसे सुलीन कहा जाता है ॥ ६८, ६६ ॥ बभूव तस्य कर्माणि पापपुण्यस्य संक्षयः । प्रयान्ति नैव लिम्पन्ति क्रियमाणानि साधुना ॥१००॥ साधु द्वारा किये जा रहे कर्म नष्ट हो जाते हैं, उसे लिप्त नहीं करते हैं, क्योंकि उसके पाप और पुण्य का संक्षय हो चुका रहता है ॥ १०० ॥ १. यहाँ पर "सरिसभूतानि" शब्द उचित प्रतीत नहीं हो रहा है अतः 'सहजभू- तात्मा" शब्द ही योग्य है ।