अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४७ ] यथा संह्रियते सर्वमस्तं गच्छति भास्करे । कर जालं तथा सर्वममनस्के विलीयते ॥ ६० ॥ जैसे सूर्य के अस्त होने पर किरणजाल संहृत (छिन्न-भिन्न) हो जाते हैं वैसे ही योगी के अमनस्क होने पर सब (विश्व) लीन हो जाता है ॥ ६० ॥ इन्द्रियग्राहनिर्मुक्ते निर्वाते निर्मलाम्ते । अमनस्कह्रदे स्नातः परामृतमुपाश्नुते ॥ ६१ ॥ जिस प्रकार मगर आदि जल जन्तुओं से मुक्त, वायुशून्य निर्मल जलवाले सरोवर में स्नान करने पर तृप्ति-लाभ होता है उसी प्रकार इन्द्रियों के प्रभाव से मुक्त तथा प्राण, अपान आदि क्रिया से शून्य अमनस्क अवस्था में अवगाहन करने पर परा शान्ति (परमसुख) प्राप्त होती है ॥ ६१ ॥ इत्युक्तमेतत् सहजामनस्कं, शिष्यप्रबोधाय शिवेन साक्षात् । नित्यं हि नूनं विगतप्रपंचं, वाचामवाच्यं स्वयमेव बोध्यम् ॥ ६२ ॥ साक्षात् भगवान् शिव जी ने शिष्यों के प्रबोध (ज्ञान) के लिए यह सहज अमनस्क योग इस प्रकार कहा । यह नित्य नूतन निष्कल, निष्प्रपंच, वाणी द्वारा कथनीय नहीं है । इसे स्वयं ही जानना चाहिये अर्थात् यह स्वानुभवैक- वेद्य है ॥ ६२ ॥ चित्ते चलति संसारोऽचले मोक्षः प्रजायते । तस्माच्चित्तं स्थिरीकुर्यादौदासीन्यपरायणः ॥ ६३ ॥१ चित्त के चंचल होने पर संसार का भान होता है और निश्चल होने पर मोक्ष का उदय होता है । अतएव उदासीन (निष्क्रिय) होकर चित्त को स्थिर करना चाहिये ॥ ६३ ॥ चतुविधा मनोवस्था विज्ञातव्या मनीषिभिः । विश्लिष्टं च गतायातं सुश्लिष्टं च सुलीनकम् ॥ ६४ ॥ विद्वान् पुरुषों को मनोवस्था चार प्रकार की जाननी चाहिये--१ विश्लिष्टा- वस्था, २ गतागतावस्था, ३ सुश्लिष्टावस्था और ४ सुलीनावस्था ॥ ६४ ॥ १. चित्तमेव हि संसार । (मैत्रेयी उपनिषद्)