अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४६ ] कदलीव महामाया समनस्केन्द्रिये सदा । अमनस्क फलं दत्त्वा सर्वथैव विनश्यति ॥ ८५ ॥ कदली (केले के पेड़) के सदृश महामाया समनस्केन्द्रिय पुरुष को एक बार अमनस्करूप फल प्रदान कर सर्वदा के लिए विनष्ट हो जाती है ॥८५॥ इन्द्रियग्राहपदयोः निश्वासोच्छ्वासपक्षयोः । संक्षीणयोर्मनः पक्षी स्थिरसत्त्वोऽवसीदति ॥ ८६ ॥ मनरूपी पक्षी, जिसके निःश्वास और उच्छ्वास रूप दो पंख हैं, जो इन्द्रिय तथा विषयालम्बन से युक्त है, के सम्यक् रूप से क्षीण होने पर उसकी सत्ता स्थिर हो जाती है और नाश को प्राप्त हो जाता है१। ॥ ८६ ॥ श्वाससूत्रशतोपेतमिन्द्रियालय संकुलम् । त्रोटयित्वा मनोजालं मीनवज्जायते सुखी ॥ ८७ ॥ जैसे मत्स्य शत सूत्रों से बने हुए और बहुत छिद्र सम्पन्न जाल को तोड़ने पर निश्चिंत हो जाता है उसी प्रकार योगी श्वास-प्रश्वास से युक्त और इन्द्रियों से प्रभावित मन का नाश कर सुखी हो जाता है ॥ ८७ ॥ प्रशान्तेन्द्रियपादातो बुद्धिशक्तिसमन्वितः । वायुयानयुतश्छित्वा मनः शत्रुं सुखी भवेत्२॥ ८८ ॥ अत्यन्त शान्त इन्द्रियां ही जिसकी पैदल सेना हैं, बुद्धि ही जिसके पास शक्ति (शक्ति नामक शस्त्र) है एवं वायु ही जिसकी सवारी है ऐसा योगी मनरूपी शत्रु को नष्ट कर सुखी हो ॥ ८८ ॥ गुणत्रयमयीं रज्जुं सुदृढामात्मबन्धनीम् । अमनस्कक्षुरेणैव च्छित्त्वा मोक्षमवाप्नुयात् ॥ ८६ ॥ योगी सत्त्व, रज और तम रूपी तीन गुणों की बनी (माया) जो आत्मा को बांधनेवाली मजबूत रस्सी है, को अमनस्क योग रूपी छुरे से ही काटकर मोक्ष को प्राप्त हो ॥ ८६ ॥ १. अर्थात् श्वास के नष्ट होने पर मन का नाश हो जाता है । २. “प्रशान्तेन्द्रियपादातं बुद्धिशक्तिसमन्वितम् । वायुयानयुतं छित्वा मनः शत्रुं सुखी भवेत् ॥” यह पाठ उपयुक्त प्रतीत होता है ।