अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४५ ] मनोदृश्यमिदं सर्वं यत् किंचित्सचराचरम् । मनसोऽप्युन्मनीभावेऽद्वैतभावः प्रकल्पते ॥ ८० ॥ जो कुछ चराचर जगत् है यह सब मन से दृश्य है । मन का उन्मनी भाव ( अर्थात् विलय ) होने पर अद्वैतभाव हो जाता है ॥ ८० ॥ जायमानामनस्कस्य ह्युदासीनस्य तिष्ठतः ( सर्वतः ? ) । मृदुत्वं च परत्वं ( लघुत्वं ? ) च शरीरस्याथ जायते ॥ ८१ ॥ अमनस्कता जिसमें उत्पन्न हो रही है और जो चारों ओर से सर्वं विषयों में उदासीन रहता है और जो स्थितिशील हो गया है ऐसे योगी का शरीर कोमल और श्रेष्ठ हो जाता है ॥ ८१ ॥ अमनस्के क्षणात्क्षीणां कामक्रोधादिवन्धनम् । नश्यतिष्करणस्तम्भं देहगेहं श्लथं भवेत् १ ॥ ८२ ॥ अमनस्क भाव का उदय होने पर क्षणभर में काम क्रोधादि बन्धन क्षीण हो जाते हैं, इन्द्रिय-स्तम्भ ( इन्द्रियसमूह ) नष्ट हो जाते हैं, देहरूपी घर शिथिल हो जाता है ॥ ८२ ॥ सहजेनामनस्केन मनःशल्ये नियोजिते । आतपत्रमिवास्तम्भं शरीरं शिथिलायते ॥ ८३ ॥ सहज अमनस्क के द्वारा मनरूपी कांटे को निकाल फेंकने पर शरीर बिना डंडे के छाते के सदृश शिथिल पड़ जाता है ॥ ८३ ॥ अमनस्कखनित्रेण समूलोन्मूलने कृते २ । अन्तःकरणशल्ये तु सुखी संजायते मुनिः ॥ ८४ ॥ अमनस्क रूपी कुदारी से अन्तःकरण ( मन ) रूपी शल्य ( कांटे ) के समूल ( जड़ सहित ) उन्मूलित होने ( उखाड़ फेकने ) पर तो मुनि ( योगी ) सुखी हो जाता है ॥ ८४ ॥ १. भिद्यते हृदयग्रन्थिः छिद्यन्ते सर्व संशयाः । क्षीयन्ते चास्यकर्माणि तस्मिन् दृष्टे परावरे ॥ ( श्रुति ) इस श्लोक का अंतिम चरण श्रीमद्भागवत ( ११.२०. ३० ) में इस प्रकार है—"मयि दृष्टेऽखिलात्मनि ।" २. समूलोन्मूलिते सति ( कृते ) ।