अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४४ ] निर्मूलप्रविनष्टमारुततया निर्जीवकाष्ठोपमो निर्वातस्थितदीपवत् १ सहजवान् यस्याः स्थितेर्लक्ष्यते २ ॥ ७७ ॥ जिस पुरुष का मन सब प्रकार के भावों से विहीन हो चुका उसकी तुरन्त आत्मनिष्ठा हो जाती है । जिसमें निष्ठा होने पर सहजवान् पुरुष के हाथ, पैर आदि इन्द्रिय-समूह निश्चेष्ट और शिथिल हो जाते हैं, विकार हट जाते हैं, वायु के निर्मूल ( उखाड़ा हुआ ) अतएव विनष्ट होने के कारण वह निर्जीव काठ के तुल्य तथा निर्वात स्थान पर स्थित दीपक की तरह निश्चल दिखाई देता है ॥ ७७ ॥ निक्षिप्तं कनकं विहाय कलुषं यद्वद् भवेन्निर्मलं निर्वातस्थितनिस्तरंगमुदकं स्वच्छस्वभावं परम् । तद्वत् सर्वमिदं विहाय सकलं देदीप्यते निष्कलं तत्त्वं तत्सहजं स्वभावममलं जातेऽमनस्के ध्रुवम् ॥ ७८ ॥ अग्नि में डाला हुआ सोना जैसे कालिमा का त्याग कर निर्मल हो जाता है एवं जैसे निर्वात ( वायु रहित ) स्थान पर जल तरंगरहित तथा स्वच्छ स्वभाव रहता है वैसे ही अमनस्क हो जाने पर सकल ( कला-सहित ) तत्त्व निश्चय ही इस प्रपंच का त्याग कर निर्मल, निष्कल सहज स्वभाव हो जाता है ॥ ७८ ॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासंगि मुक्तये निर्विषयं मनः ॥ ७६ ॥ मन ही मनुष्यों के बन्ध और मोक्ष का हेतु है । विषयों में आसक्त मन बन्धन के लिए और निर्विषय मन मुक्ति के लिए कारण होता है ३ ॥ ७६ ॥ १. गीता ६।१६ देखिये । २. स्थितिलक्ष्यते । ३. आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मैव रिपुरात्मनः ॥ गीता ० ६ । ५ ॥ मन एव मनुष्याणां कारणं बन्धमोक्षयोः । बन्धाय विषयासक्तं मुक्तिर्निर्विषयं स्मृतम् ॥ ( पंचदशी )