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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

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[ ४३ ] यथा निरंकुशो हस्ती कामान् प्राप्य निवर्तते । अवारितं मनस्तद्वत् स्वयमेव विलीयते ॥ ७३ ॥ जैसे निरंकुश हाथी अपने अभिलषित पदार्थों को प्राप्त कर लौट जाता है वैसे ही अवारित ( न रोका गया ) मन भी अपनी इच्छा पूरी कर अपने आप शान्त हो जाता है ॥ ७३ ॥ निवार्य्यमाणं यत्नेन तत्कर्तुं नैव शक्यते । न तिष्ठति क्षणेनैव मारुतस्य वशोदयात् ॥ ७४ ॥ मन प्रयत्नपूर्वक निवारित करने पर भी निवारित नहीं किया जाता है । वह ( मन ) वायु के वशीभूत रहने के कारण एक क्षण के लिये भी स्थिर नहीं रहता ॥ ७४ ॥१ दुर्निवार्यं मनस्तद्वद्यावत्तत्त्वं न विन्दति । विदिते तु परे तत्त्वे मनो नौस्तम्भकाकवत् ॥ ७५ ॥ वैसे ही जब तक तत्त्व प्राप्त नहीं होता तब तक इधर उधर भागता हुआ मन दुर्निवार्य है । पर-तत्त्व जब प्राप्त हो जाता है तब मन समुद्र में जहाज के ( स्तम्भ ) मस्तूल पर बैठे हुए कौए की तरह स्थिर हो जाता है ॥ ७५ ॥ यथा तुलां तुलाधारश्चंचलां कुरुते स्थिराम् । याने सौख्ये सदाभ्यासान्मनोवृत्तिस्तदात्मनि ॥ ७६ ॥ जैसे तराजू से तोलनेवाला बनिया चंचल तराजू को स्थिर कर देता है उसी प्रकार सदा के अभ्यास से यान में तथा सुख में मनोवृत्ति सदा आत्मा में स्थिर रहती है ॥ ७६ ॥ निष्पन्नाखिलभावशून्यनिस्तृजः ( मनसः ? ) स्वान्तःस्थितस्तत्क्षणा त् निश्चेष्टश्लथपाणिपादकरणग्रामो विकारोज्झितः । १. चञ्चलं हि मनःकृष्ण प्रमाथि बलवद्दृढम् । तस्याहं निग्रहं मन्ये वायोरिव सुदुष्करम् ॥ ( श्री० गीता ६/३४ )

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