अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४२ ] प्रसह्य संकल्पपरम्पराणामुच्छेदने संततसावधानाम् । आलम्बभावादपचीयमाना शनैः शनैः शान्तिमुपैतिदृष्टिः ॥ ६८ ॥ संकल्प-परम्पराओं के बलात् उच्छेद में (विनाश करने में) सदा साव- धान दृष्टि आलम्बन के अभाव से नष्ट (क्षीण) होती हुई धीरे-धीरे शान्त हो जाती है ॥ ६८ ॥ यथा यथा सदाभ्यासान्मनसः स्थिरता भवेत् । वायुवाक्कायदृष्टीनां स्थिरता च तथा तथा ॥ ६६ ॥ सदा के अभ्यास से जैसे जैसे मन में स्थिरता आती है वैसे वैसे वायु, वाणी और शरीर में स्थिरता आ जाती है ॥ ६६ ॥ दृश्यं पश्यति (!) येन सत्प्रियकरं श्राव्यं तथा शृण्वतः घ्रातव्यं परिजिघ्रतोऽथवदतो ध्येयं सदा ध्यायतः । स्पर्शं च स्पृशतो निरन्धनशिखा प्रख्यं मनोऽत्र क्रमाद् अद्वैताख्यपदस्य तत्त्वपदवीं प्राप्तस्य सद्योगिनः ॥ ७० ॥ सुन्दर दृश्य को देख रहे, मनोहारी श्रव्य को सुन रहे, सूंघने योग्य सुन्दर पदार्थों को सूंघ रहे, वक्तव्य वचनों को बोल रहे, ध्येय तत्त्व का हृदय में ध्यान कर रहे, स्पृश्य वस्तु का स्पर्श कर रहे, अद्वैत पद के तत्त्व को प्राप्त हुए सद्योगी का मन क्रम से निरन्धन अग्निशिखा के तुल्य शान्त हो जाता है ॥ ७० ॥ यदा यत्र यथा यत्र स्थिरं भवति मानसम् । तदा तत्र तथा तस्माद् न तु चाल्यं कदाचन ॥ ७१ ॥ अतः जब जहाँ पर जिस प्रकार मन स्थिर हो तब वहाँ उसी प्रकार उसको रहने देना चाहिये । वहाँ से उसे कदापि नहीं हटाना चाहिये ॥ ७१ ॥ यत्र यत्र मनो याति न निवार्यं ततस्ततः । अवारितं क्षयं याति वार्यमाणं तु वर्द्धते ॥ ७२ ॥ जहाँ जहाँ मन जाय वहाँ वहाँ से उसे निवृत्त करना (हटाना) नहीं चाहिये । अवारित मन (न हटाया गया, न रोका गया मन) क्षय को प्राप्त हो जाता है । यदि उसे रोका जाय तो वह बढ़ता है ।: ७२ ॥