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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ४१ ] यथा सुप्तोत्थितः कश्चिद् विषयान् प्रतिपद्यते । जागर्त्येव ततो योगी योगनिद्राक्षये तथा ॥ ६५ ॥ जैसे सोकर उठा हुआ कोई पुरुष रूप, रसादि विषयों को प्राप्त करता है वैसे योगनिद्रा के समय में योगी जागता ही रहता है, इसलिए वह योगी है ॥ ६५ ॥१ सर्वतो भविता दृष्टिः प्रत्याभू (नी ?)ता शनैः शनैः । परतत्त्वमनादर्शं पश्यत्यात्मानमात्मना . ॥ ६६ ॥ चारों ओर फैलाई हुई दृष्टि जब धीरे धीरे प्रत्याहृत होकर लौटती है तब साधक परतत्त्व को अपने में अपने आप देखता है ॥ ६६ ॥२ प्रथमं निःसृतादृष्टिः संगता यत्र कुत्रचित् । स्थिरीभूता च यत्रैव विनश्यति शनैः शनैः ॥ ६७ ॥ पहले निकली हुई ( निर्गत ) दृष्टि जहाँ कहीं संलग्न होती है वहीं पर स्थिर होकर धीरे-धीरे नष्ट हो जाती है ॥ ६७ ॥३ त्रिपुरा रहस्य ज्ञानखण्ड में भी कहा है कि— निद्राजाग्रन्मध्यभागे संविद्भेदान्तरे तथा । मध्ये संविद्वययोश्च सूक्ष्मबुद्ध्याऽभिलक्षय ॥ ६ । ९४ ॥ एतत्पदं निजं रूपं यत् प्राप्य न विमुह्यति । एतदज्ञानमात्रेण प्रवृत्तं जगदीदृशम् ॥ ६ । ९५ ॥ १. साधारण व्यक्ति निद्रा की अवस्था से जाग करके जैसे विषय का ग्रहण करते हैं वैसे योगी योगनिद्रा समय में भी विषय ग्रहण करते हुए जागता ही रहता है । अर्थात् लौकिक दृष्टि से प्रतीत होता है कि वह साधा- रण मनुष्य के सदृश जागता है परन्तु वास्तव में यह योगी निद्रा में ही स्थित है । २. दृष्टि प्रत्याहृत करना = अंतर्मुख करना । ३. नष्ट हो जाती है = उसी में लीन हो जाती है ।