अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ ४० ] स्वप्नजागरणोपेता जन्तवो जगतीं गताः। योगिनस्तत्त्वसम्पन्ना न जाग्रति न शेरते ॥ ६१ ॥ संसार को प्राप्त जीव अर्थात् सांसारिक लोग स्वप्न और जागरणवाले हैं अर्थात् वे सोते भी हैं और जागते भी हैं। किन्तु तत्त्वसम्पन्न योगी जन न जागते हैं और न सोते हैं; वे स्वप्नजागरणविहीन हैं ॥ ६१ ॥ स्वप्ने चिदंशशून्यत्वं जागरे विषयग्रहः । स्वप्नजागरणातीतमतस्तत्त्वं विदुर्बुधाः ॥ ६२ ॥ स्वप्न में चिदंश नहीं रहता और जागरण में विषयों का ग्रहण होता है, इसलिए विद्वान् पुरुष तत्त्व को स्वप्न और जागरण से अतीत कहते हैं । अथवा इसलिए स्वप्न और जागरण से अतीत को तत्त्व कहते हैं ॥ ६२ ॥ भावाभावद्वयातीतं स्वप्नजागरणातिगम्। मृत्युजीवननिर्मुक्तं तत्त्वं तत्त्वविदो विदुः ॥१ ६३ ॥ तत्त्व के जानकर विद्वान् तत्त्व को भाव और अभाव दोनों से अतीत, स्वप्न और जागरण से परे एवं मरण और जीवन से रहित जानते हैं ॥६३॥ निद्रादौ जागरस्यान्ते यो भाव उपपद्यते । तं भावं भावयेद् योगी निश्चितं मुक्त एव सः ॥ ६४ ॥ निद्रा के आदि में और जागरण के अन्त में जो भाव होता है उस भाव की जो योगी भावना करे वह निश्चय रूप से मुक्त ही है ॥ ६४ ॥२ १. अद्वैतं केचिदिच्छन्ति द्वैतमिच्छन्ति चा परे । समतत्त्वं न विन्दन्ति द्वैताद्वैतविवर्जितम् ॥ ( अवधूत गीता १/३५ ) २. जागृत अवस्था के अन्त में जब विषयज्ञान तिरोहित हो जाता है और निद्रा के आदि में जब जड़त्वज्ञान ( अज्ञान ) का उदय होता है, इन दो अवस्थाओं के बीच में ( सन्धि में ) क्षणभर के लिए जिस अवस्था का स्फुरण रहता है वही शुद्ध चैतन्य अवस्था है । इसे सायंसंध्या कहते हैं। निद्रा भंग होने के बाद और विषयज्ञान उदय होने से पूर्व ठीक इसी प्रकार की सन्धि अवस्था में शुद्ध चैतन्य का उदय होता है जिसे प्रातः- सन्ध्या कहते हैं ।