भारतकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ३६ ] स्वयं प्रकाशिते तत्त्वे तत्क्षणात्तन्मयो भवेत् । इदं तदिति तद्वक्तुं गुरुणापि न शक्यते ॥ ५६ ॥ तत्त्व जब स्वयं प्रकाशित होता है तब तत्क्षण उपासक (योगी) तत्त्वमय हो जाता है । 'यह वह (तत्त्व) है' इस प्रकार उसका प्रतिपादन गुरु भी नहीं कर सकते ॥ ५६ ॥१ वाङ्मनःकाय-संक्षोभं प्रयत्नेन विवर्जयेत् । शिलाचित्रमिवात्मानं सुस्थिरं धारयेत्तदा ॥ ५७ ॥ वाणी, मन तथा शरीर के क्षोभ का प्रयत्नपूर्वक परित्याग करना चाहिये अर्थात् साधक सदा ऐसा प्रयत्न करे कि जिससे वाणी, मन और शरीर में क्षोभ न आवे । तब शिला की प्रतिमा के समान अपने शरीर को खूब सुस्थिर (निश्चल) रखना चाहिये ॥ ५७ ॥ यावत्प्रयत्नलेशोऽस्ति यावत्संकल्पकामना । अहं त्वमिति सम्प्राप्तिस्तावत्तत्त्वस्य का कथा ॥ ५८ ॥ जब तक थोड़ा सा भी प्रयत्न रहेगा, जब तक संकल्प-कामना होगी, अहं त्वम् (मैं तुम का ज्ञान है अर्थात् मैं और तुम इस प्रकार का द्वैत बोध रहेगा तब तक तत्त्व की बात कहां ? ॥ ५८ ॥ औदासीन्यामृतौघेन वर्धमानेन योगिनाम् । उन्मूलितमनोमूलो जगद्वृक्षः पतिष्यति ॥ ५६ ॥ योगियों के निरन्तर बढ़ रहे औदासीन्यरूपी अमृत के प्रवाह से मन रूपी मूल (जगत् की जड़) के उखड़ जाने पर, उन्मूलित हो जाने पर जगद्रूपी वृक्ष गिर जाएगा ॥ ५६ ॥ सदा जाग्रदवस्थायां स्वप्नवद् योऽवतिष्ठते । निःश्वासोच्छ्वासहीनस्तु निश्चितं मुक्त एव सः ॥ ६० ॥ जो योगी सदा जाग्रत् अवस्था में स्वप्नवत्, निःश्वास और उच्छ्वास से विहीन रहता है वह निश्चय मुक्त ही है ॥ ६० ॥ १—"इदं तत्"=प्रत्यभिज्ञा होना ।