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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ३८ ] शिथिलीकृतसर्वाङ्ग आनखाग्रशिखाग्रतः । सबाह्याभ्यन्तरे सर्व चिन्ताचेष्टाविवर्जितः ॥ ५२ ॥ यदा भवेदुदासीनस्तदा तत्त्वं प्रकाशते । स्वयं प्रकाशिते तत्त्वे स्वानन्दस्तत्क्षणाद् भवेत् ॥ ५३ ॥ पैर के नख से लेकर शिखा के अग्रभाग तक सम्पूर्ण अंगों को शिथिल कर योगी बाहरी और भीतरी सब चिन्ता और चेष्टा का त्याग कर जब उदासीन होगा तब अमनस्क तत्त्व का प्रकाश होता है । उक्त तत्त्व के स्वयं प्रकाश में आने पर आत्मानन्द तत्क्षण प्राप्त होता है ॥ ५२,५३ ॥१ आनन्देन च सन्तुष्टः सदाभ्यासरतो भवेत् । सदाभ्यासे स्थिरीभूते न विधिर्नैव च क्रमः ॥ ५४ ॥ आनन्द से सन्तुष्ट होकर सदा अभ्यास में निरत रहना चाहिये । सदा अभ्यास के स्थिर होने पर फिर न कोई विधि है और न कोई क्रम है ॥५४॥२ न किंचिच्चिन्तयेद् योगी औदासीन्यपरो भवेत् । न किंचिच्चिन्तनादेव स्वयं तत्त्वं प्रकाशते ॥ ५५ ॥ योगी कुछ भी चिन्तन न करे, औदासीन्यपरायण हो । कुछ चिन्तन न करने से ही तत्त्व स्वयं प्रकाश में आ जाता है ॥ ५५ ॥३ १. देखिये श्री गीता, अध्याय ६, श्लोक १४ एवं १५ । २. विधि = कर्तव्य निश्चय । क्रम = पूर्वापरभाव ( प्रथम, द्वितीय, तृतीय ) अर्थात् करणीय कर्म किस नियम से, किस समय में, किस प्रकार करना चाहिये, यह सब जानने की आवश्यकता नहीं है । ३. “चिंतन न करने का अभ्यास करना चाहिये” अर्थात् गीता के ६।२५ ( शनैःशनैरुपरमेद्बुद्ध्या धृतिगृहीतया । आत्मसंस्थं मनः कृत्वा न किंचिदपि चिन्तयेत् ) के अनुसार आत्मस्वरूप में मन को बैठाकर सर्वप्रकार के विषयों का चिंतन वर्जन करे और चित्त कर्तृत्वबोधशून्य रहे ।