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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ३७ ] गुरुणा दर्शिते तत्वे तत्क्षणात्तन्मयो भवेत् । विमुक्तं मन्येतात्मानं मुच्यते नात्र संशयः ॥४७॥ श्री गुरु द्वारा उसके अर्थात् अमनस्क योग के प्रदर्शित किये जाने पर शिष्य को तत्क्षण तन्मय हो जाना चाहिये और अपने को विमुक्त समझना चाहिये । इस प्रकार का शिष्य अवश्य मुक्त हो जाता है, इसमें संशय नहीं है ॥ ४७ ॥ यथा सिद्धरसस्पर्शात् ताम्रं भवति काञ्चनम् । गुरूपदेशश्रवणाच्छिष्यस्तत्त्वमयस्तथा ॥४८॥ जैसे सिद्ध ( शोधे गये ) पारे के स्पर्श से तांबा सोना हो जाता है, वैसे ही गुरु के उपदेश सुनने से शिष्य तत्त्वमय हो जाता है । ४८ ॥ तस्मादुपासनात् सम्यक् सहजं प्राप्यते गुरोः । अनायासेन सततमात्माभ्यासरतो भवेत् ॥४६॥ इसलिए गुरु की भलीभांति उपासना करने से वह सहज तत्त्व (अमनस्क) अनायास गुरु से प्राप्त होता है । शिष्य को उसको प्राप्त कर निरन्तर आत्मा- भ्यास करना चाहिये ॥४६॥ विविक्ते विजने देशे पवित्रेऽतिमनोहरे । समासने सुखासीनः पश्चात् किंचित्समाश्रयेत् ॥५०॥ सुखस्थापितसर्वाङ्गः सुस्थिरात्मा सुनिश्चलः । बाहुदण्डप्रमाणेन कृतदृष्टिः समभ्यसेत् ॥५१॥ पवित्र निर्जन मनोहर प्रदेश में सम आसन पर कुछ पीछे की ओर तनकर सुखपूर्वक आसीन होकर१ सुख से सब अंगों को यथास्थान स्थापित कर, सुस्थिर चित्त और निश्चल होकर एक हाथ तक आगे की ओर दृष्टि लगाकर अभ्यास करे ॥ ५०, ५१ ॥ ————————————————— १—देखिये श्री गीता— “समं कायशिरोग्रीवं धारयन्नचलं स्थिरः । संप्रेक्ष्य नासिकाग्रं स्वं दिशश्चानवलोकयन् ॥६।१३॥” एवं श्री पातञ्जल योगसूत्र, ‘स्थिरसुखमासनम्’ ॥२।४६॥

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