भारतकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 108, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 108

[ ३६ ] यस्मिन्नभ्युदिते विनश्यति बली वायुः स्वयं तत्क्षणात् प्राप्त्यैतत्सहजं स्वभावमनिशं सेवध्वमेकं गुरुम् ॥ ४३ ॥ विविध व्याधियां उत्पन्न करनेवाले, बड़ी कठिनाई से करने योग्य, दुःखरूप, दुर्जय तथा अनेक साधनों से सम्पन्न होनेवाले सैंकड़ों प्राणायामों के सुदीर्घ काल तक अभ्यास करने से क्या लाभ ? जिसके उदित होने पर बलवान् वायु स्वयं तत्क्षण विनष्ट हो जाता है उसी सहज स्वभावभूत अमनस्क की प्राप्ति के लिए निरन्तर एकमात्र गुरु की सेवा करो ॥ ४३ ॥ गुरुर्ब्रह्मा गुरुर्विष्णुर्गुरुर्देवो महेश्वरः । गुरुदेवात्परं नास्ति तस्मात्तं पूजयत्सदा ॥ ४४ ॥ गुरु ब्रह्मा है, गुरु विष्णु है, गुरु ही देवाधिदेव महादेव हैं । गुरुदेव से बढ़कर दूसरा कोई नहीं है । इसलिए सदा गुरु की पूजा-अर्चा करनी चाहिये ॥ ४४ ॥ दृष्टिः स्थिरा यस्य विना निमेषाद् , वायुः स्थिरो यस्य विना निरोधात् । चित्तं स्थिरं यस्य विनावलम्बात् , स एव योगी स गुरुः स सेव्यः ॥ ४५ ॥१ जिसकी निमेष ( पलक गिरने ) के बिना ही दृष्टि स्थिर हो, निरोध के बिना ही जिसका वायु स्थिर हो, बिना किसी अवलम्ब के जिसका चित्त स्थिर हो वही योगी है वही गुरु है, उसीकी सेवा करनी चाहिये ॥ ४५ ॥ अमनस्कं सुशिष्येषु संक्राम्येन्द्रियजं सुखम् । निवारयन्ते ते वन्द्या गुरवोऽन्ये प्रतारकाः ॥ ४६ ॥ जो सुशिष्यों में 'अमनस्क' को संक्रान्त कर इन्द्रियजन्य सुख को हटाते हैं, निवृत्त करते हैं वे गुरु वन्दनीय हैं उनसे अन्य गुरु-गुरु नहीं हैं वंचक हैं ॥४६॥ १. प्रथमखण्ड के १४ वें श्लोक में यही भाव व्यक्त है ।