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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

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[ ३५ ] संकल्पमूलःध्यानादि चिन्ताशास्त्रे समाकुलाः । क्लेशेनापि न विन्दन्ति प्राप्तव्यस्थानमीप्सितम् ॥४०॥ संकल्पमूलक ध्यान आदि की विचार-चर्चा से भरे हुए शास्त्रों में श्राकुलमति लोग क्लेश से भी अपने अभीष्ट गन्तव्य स्थान को नहीं जान पाते हैं ॥ ४० ॥ वेदान्ततर्कोक्तिभिरागमैश्च नानाविधैः शास्त्रकदम्बकैश्च । ध्यानादिभिः सत्करणैर्नगम्यं चिन्तामणिं ह्येकगुरुं विहाय ॥४१॥ चिन्तामणिस্বরূপ एकमात्र गुरु के अनुग्रह के सिवा वेदान्त प्रतिपादित महावाक्यों के उपदेशों से, तर्कशास्त्र में प्रतिपादित युक्तियों के कथनों से, श्रागमों के अध्ययन से विविध प्रकार के अन्यान्य शास्त्रों के ज्ञानार्जन से ध्यानादि उत्तम साधनों से अपने गन्तव्य स्थान की प्राप्ति संभव नहीं है ॥४१॥ तस्मान्नूनं सकलविषया निष्कलाध्यात्मयोगाद् वायोर्नाशस्तदनु मनसस्तद्विनाशाच्च मोक्षः । स्याच्चेदेवं सहजममलं निर्विकारं निरीहं ज्ञात्वा यत्नं कुरुत कुशलाः पूर्वमेवामनस्के ॥४२॥ इसलिए यह निश्चित है कि सब विषय निष्कल अध्यात्मयोग से विनष्ट होते हैं। आत्मयोग से ही वायु का विनाश होता है, वायु विनाश के उपरान्त मन का विनाश होता है और मनके विनाश से मोक्ष होता है। यदि सहज, निर्मल, निर्विकार और निरीह आत्मतत्त्व का ज्ञान प्राप्त कर ऐसा होता हो तो हे कुशल पुरुषो, पहले ही अमनस्क के सम्बन्ध में अर्थात् अमनस्क प्राप्ति के लिए यत्न करो ॥ ४२ ॥ अभ्यस्तैः किमुदीर्घकालममलैर्व्याधिप्रदैर्दुष्करैः प्राणायामशतैरनेककरणैर्दुःखात्म कैदुर्जयैः।