अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंप्रस्तावना अमनस्क नाम का क्षुद्र ग्रन्थ योगशास्त्र के अंतर्गत एक प्रसिद्ध ग्रन्थ है। बहुत वर्षों पहले इस ग्रन्थ के एकाधिक संस्करण प्रकाशित हुए थे। उनमें से बंगला लिपि में मुद्रित एक संस्करण मैंने देखा था। परंतु इस समय इस ग्रन्थ की उपलब्धि अत्यंत कठिन हो गयी है। अधिकांश तंत्र ग्रन्थों के सदृश यह ग्रन्थ भी वक्ता और श्रोता के प्रश्नोत्तर के रूप में लिखा गया है। इस रचना में श्रोता हैं मुनि वामदेव और वक्ता हैं कैलासवासी शंकर महादेव। कई लोगों के मत से यह ग्रन्थ गोरक्षनाथ का बनाया हुआ है। परंतु यह कहाँ तक ठीक है, यह नहीं कहा जा सकता। यह ग्रन्थ दो भागों में विभक्त है, पूर्वार्द्ध एवं उत्तरार्द्ध। पूर्वार्द्ध में ६८ श्लोक हैं और इसमें तारकयोग का विवरण दिया हुआ है। उत्तरार्द्ध में ११३ श्लोक हैं जिसमें अमनस्कयोग का सविशेष व्याख्यान किया गया है। ग्रन्थकार के अनुसार अमनस्कयोग ही जीवन्मुक्ति का सोपान है। योग के दो प्रकार हैं - पूर्व तथा उत्तर। पूर्वयोग अर्थात् तारकयोग में मन रहता है परन्तु उत्तरयोग अर्थात् अमनस्क योग में मन बिलकुल नहीं रहता। उत्तरयोग ही मुख्य योग है। जैसे प्रचलित पातंजलयोग दर्शन में दो प्रकार के योग का विवरण मिलता है, यह भी ठीक उसी प्रकार का है।