अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)
Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj
गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें[ १८ ]
भगवान् पतंजलि के अनुसार योग के संप्रज्ञात तथा असंप्रज्ञात नाम के दो प्रकार हैं। असंप्रज्ञात योग ही मुख्य योग है, क्योंकि इसीमें चित्त की वृत्तियों का पूर्ण निरोध हो जाता है। यह असंप्रज्ञातयोग भवप्रत्यय असंप्रज्ञात नहीं है जो कि प्रकृतिलय के नाम से प्रसिद्ध है। यह उपायप्रत्यय है। उपाय शब्द से प्रज्ञा समझना चाहिए। श्रद्धा, वीर्य, स्मृति और समाधि से प्रज्ञा का उदय होता है। इस प्रज्ञा के निरोध से उपायप्रत्यय असंप्रज्ञातयोग समाधि होती है। यही योगपद वाच्य है। संप्रज्ञात समाधि में क्षिप्त, विक्षिप्त और मूढ़ वृत्तियों का निरोध होकर एकाग्र भूमि में स्थिति होती है। यह भी गौण दृष्टि से योगपद वाच्य है, क्योंकि इस भूमि में विशुद्ध ज्ञान का उदय होता है और अज्ञान की निवृत्ति हो जाती है। परंतु मुख्य दृष्टि से यह भी पूर्ण योग नहीं है। जब एकाग्र भूमि में उपलब्ध प्रज्ञा का निरोध हो जाता है तभी सर्वचित्त- वृत्तिनिरोधरूप योग का उदय होता है। स्थूल दृष्टि से देखने पर यह प्रतीत होता है कि पतंजलि की प्रक्रिया और वर्तमान ग्रन्थ की प्रक्रिया सर्वथा अनुरूप है। जैसे संप्रज्ञात भूमि में मन रहता है उसी प्रकार पूर्वयोग या तारक योग में भी मन रहता है। पक्षांतर में जैसे असंप्रज्ञात योग में मन नहीं रहता, उसी प्रकार उत्तर योग अथवा अमनस्कयोग में भी मन नहीं रहता। केवल मन की निवृत्ति होने से योग नहीं होता क्योंकि प्रकृतिलय की अवस्था मे भी मन का लय होता है। अथच वह योग नहीं है। मन का लय तो होना चाहिए, इसमें संदेह नहीं, परन्तु सत्यज्ञान का भी उदय होना चाहिए। अमनस्कयोग में भी यही बात है, क्योंकि अमनस्क में आत्मा का साक्षात्कार होता है। लय के प्रसंग में प्राण तथा मन का सम्बन्ध विचारणीय है। हठयोगी लोग कहते हैं कि प्राण का लय हो जाने से मन का लय होता है। वे लोग यह भी मानते हैं कि मन का लय हो जाने से प्राण का लय होता है। दोनों में परस्पर सम्बन्ध है। हठयोगी संप्रदाय प्राण के लय से मन के लय तक पहुँचने का उद्यम करते थे। ये लोग समझते हैं कि प्राण का लय क्रियासापेक्ष है। देह, इंद्रिय, मन प्रभृत्ति की क्रियाएं परस्पर संबद्ध हैं। देह तथा प्राण का निरोध हो जाने पर मन का निरोध हो सकता है। इसलिए ये लोग अपने प्रयत्न से हठक्रिया के द्वारा इनका निरोध करने के लिए प्रयत्न करते हैं। यह निरोध लयात्मक है। तारकयोग में दिखाया गया है कि विभिन्न मात्राओं में लय के विभिन्न प्रकार के फल होते हैं। यह लय के कालगत तारतम्य का विवरण है। प्राण के अल्प समय के लिए निरुद्ध होने पर जिस प्रकार की सिद्धि उत्पन्न होती है, वहीं, उसी प्रकार, अधिक समय के लिए निरुद्ध होने