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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

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[ २१६ ] पर उससे उन्नत कोटि की सिद्धि का संपादन होता है। इसका तात्पर्य यह है कि विभिन्न प्रकार की सिद्धियों का उदय प्राण के नियंत्रणकाल की अवधि के ऊपर निर्भर है। यहाँ तक कि २४ वर्ष तक प्राण का निरोध होने पर शक्ति तत्त्व तक आयत्त हो सकता है। इस प्राण के लय के समान ही मन का भी लय होता है। प्राण का जहाँ लय होता है, उसी स्थान पर मन का भी लय होता है। इसलिए सिद्धि के उदय के विषय में प्राण के लय के साथ मन का लय भी संबंधित है। परन्तु यह विचारणीय है कि प्राण तथा मन का लय साथ-साथ सम्भव होने पर भी अंतिम भूमि की प्राप्ति तक यह नहीं हो सकती। प्राण के लयस्थान में मन का भी लय हो जाता है, यह सत्य है। परन्तु यह अपरा सिद्धि है। यह किसी न किसी समय नष्ट हो जायगी, मन पुनर्वार लौट आयेगा। मन का लय तभी यथार्थ लय कहा जा सकता है, जब वह पुनरावर्तन न करे। श्रीमद्भगवद्गीता में कहा गया है— यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम ॥ १५.६॥ यह लयस्थान कोई खण्ड तत्त्व नहीं हो सकता। यही ब्रह्मतत्त्व वा आत्मतत्त्व है। यहीं मन का लय करना चाहिए। उसके प्रभाव से मन हमेशा के लिए शांत हो जायगा और उसकी पुनरावृत्ति नहीं होगी। अमनस्कयोग का यही लक्ष्य है। प्राण का लय केवल शक्ति तक है। यह प्रकृति लय के अनुरूप है और मन का लय ब्रह्म तक है। यही यथार्थ योग है। पूर्व योग में केवल शक्ति तक स्थिति होती है। उत्तरयोग में पूर्ण ब्रह्मरूपेण स्थिति होती है। मन की पुनरावृत्ति नहीं होती। यह मन निवृत्ति का सहज तथा सरल उपाय है। सद्गुरु के बिना इस सहज अवस्था का उदय नहीं होता। मन का लय हो जाने से अनंत प्रकार के विकल्पजाल अपने आप शांत हो जाते हैं। प्राण भी शांत हो जाता है इंद्रियों का उपशम हो जाता है। अमनस्क के रचयिता के अनुसार यही राजयोग है जिसके पूर्व के योग को प्राणयोग या हठयोग कहा जाता है। यहाँ एक प्रश्न का उदय होता है। यह विचारणीय होने पर भी, यहाँ इस समय इसकी मीमांसा करना कठिन है। मालूम पड़ता है कि मत्स्येन्द्र- नाथ और गोरक्षनाथ में घनिष्ठ सम्बन्ध होने पर भी दोनों में कुछ अंश में वैलक्षण्य था। मत्स्येन्द्रनाथ जो मच्छंद के नाम से भी प्रसिद्ध हैं और जिनका उल्लेख आचार्य अभिनवगुप्त ने अपने तंत्रालोक में किया है, कौलमत के प्रवर्तक थे, ऐसी प्रसिद्धि है। कौलमत के आदि प्रवर्तक ऋषि दुर्वासा थे, परन्तु

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