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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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वर्तमान युग में इस मत का पुनरुत्थान मत्स्येन्द्रनाथ ने ही किया था। हठयोग विषयक ग्रन्थों से यह ज्ञात होता है कि मत्स्येन्द्रनाथ ने स्वच्छन्द भैरवी से आगम प्राप्त किया था। कौल साहित्य पर मत्स्येन्द्रनाथ का विशेष प्रभाव पड़ा हुआ है। इस मत में दूतीयाग की विशेष आवश्यकता समझी जाती है। यह शाक्त धर्म के अनुकूल मार्गविशेष है। परन्तु अमनस्क ग्रन्थ में गुरुतत्व के विचारप्रसंग में इसके ऊपर कटाक्षपात किया गया है। अर्थात् कौल मार्ग का गुरु यथार्थ गुरु नहीं हो सकता। यही उसका आशय है। प्राचीन हठमार्गः जो मार्कण्डेय ऋषि द्वारा प्रवर्तित था, अब लुप्त हो गया है परन्तु मत्स्येन्द्र द्वारा प्रवर्तित हठयोग इस समय प्रचलित है। यह हठमार्ग प्राण के नियंत्रण का उपदेश देता है। इसका तत्काल का लक्ष्य है शक्ति को प्राप्त करना। परंतु अमनस्कसम्मत राजमार्ग का उद्देश्य है मन का नियंत्रण। केवल नियंत्रण नहीं प्रत्युत मन का आत्यंतिक लय, जो कि ब्रह्मतत्व में ही सम्भव है, शक्ति तत्त्व में नहीं। गोरक्ष शिवभाव के अनुगामी हैं, ऐसा प्रतीत होता है। इसी- लिए अमनस्कसम्मत गुरु अपने स्वातंत्र्य के बल से शिष्य की आत्मा की मनोलय के विषय में सहायता करते हैं। मन का लय हो जाने पर प्राण का लय अपने आप होता है। इसके लिए विशेष प्रयत्न की आवश्यकता नहीं होती। यह भी ख्याल रखना चाहिए कि यह तारक योग पतंजलिनिर्दिष्ट तारक- ज्ञान से विलक्षण है। पतंजलि ने कहा है 'तारकं सर्वविषयं सर्वथाविषयं अक्रमं च इति विवेकजं ज्ञानम्'—यह तारकज्ञान अक्रमज्ञान है। विवेकजज्ञान का ही यह एकदेश है। अक्रम शब्द से यह पता चलता है कि यह काल के अधीन नहीं रहता है, क्योंकि मन की क्रिया में क्रम की अपेक्षा रहती है। यह अमनस्क प्रचलित उन्मनी से अभिन्न है इसमें संदेह नहीं है। परन्तु आगमोक्त उन्मनी में जो वैलक्षण्य दिखाया गया है इसमें उसका निर्देश नहीं है। इस पर भी दोनों का स्वरूप अभिन्न ही प्रतीत होता है, क्योंकि आग- मवर्णित उन्मनी स्थिति प्रणव के पूर्ण विकास के अनंतर शब्दातीत परम स्थिति है। अ उ म, बिंदु, अर्द्धचन्द्र, निरोधिका नाद नादांत, व्यापिनी, समना, उन्मना—ये ही सब प्रणव की कलाएं हैं। इनमें से समना तक साधारण समझना चाहिए। बिंदु अर्द्धमात्रा रूप से ग्राह्य है। उसके बाद प्रत्येक स्थिति में काल सम्बन्ध रूप मात्रा क्षीण होती रहती है। इस प्रकार से समना भूमि में काल की परम अपकृष्ट मात्रा का सम्बन्ध रहता है। यह