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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ २१ ] मात्रा एक मात्रा का २५६ वाँ अंश अथवा किसी-किसी मत में एक मात्रा का ५१२ वाँ अंश माना जाता है । इसके बाद मन के अंश का अर्पण हो जाता है । तब समना भूमि समास हो जाती है । परन्तु समना भूमि अतिक्रमण करने से अर्थात् समना भूमि का अतिक्रमण करने पर भी, अर्थात् मनोवृत्ति पूर्णरूपेण सिद्ध होने पर भी उन्मना का उदय नहीं होता । मन का न रहना अर्थात् मन का सम्यक् लय आत्मशुद्धि का चरम उत्कर्ष है । अमनस्ककार कहते हैं कि यहाँ ही पूर्णता है, परन्तु आगम के मत से यहाँ पूर्णता नहीं है क्योंकि आगम की दृष्टि से आत्मा के तीन प्रकार के आवरण विद्यमान हैं—१—प्रकृति का गुणावरण, २—निर्गुण आवरण में माया का आवरण, ३—मायातीत अवस्था में भी शुद्ध माया या महामाया का आवरण जिसको बैन्दव आवरण नाम से भी कहीं-कहीं कहा गया है । समना भूमिभेद हो जाने पर ये सब आवरण नहीं रहते । आणव मल की निवृत्ति पूर्णतया जब तक न हो तब तक सर्वावरणों का मूल रह ही जाता है । यह परम कैवल्य रूप से प्रसिद्ध स्थान है । आत्मा परम शुद्ध केवली रूप में यहाँ प्रकाशमान होती है । यह निर्वाण- पद है, यह परिनिर्वाण पद है, यह भी सत्य है परन्तु यह भी पूर्णत्व नहीं है क्योंकि यहाँ सर्वावरण का मूल आणवमल अब भी आभासरूपेण रह जाता है । इसलिए यहाँ शिवत्व का उदय नहीं होता । अविद्यानिवृत्ति, दुःखनिवृत्ति ( ऐकांतिक, आत्यंतिक ) तथा क्लेशनिवृत्ति, सब कुछ हो गया, सिद्ध अव- स्थाओं का भी अतिक्रमण हो गया तथापि यह पूर्णत्व नहीं है, क्योंकि इसमें उन्मनी शक्ति का विकास नहीं है । मनोवृत्ति और उन्मनी शक्ति का विकास एक नहीं है । किसी-किसी की मनोवृत्ति पूर्णतया हो जाने पर भी उन्मनी शक्ति का विकास नहीं होता । जिसका ऐसा विकास नहीं होता, उसका परम शिवमयं धाम में प्रवेश असम्भव है । उन्मनी शक्ति में प्रवेश ही श्री भगवान् के अनुग्रह का चरम निदर्शन है । परन्तु आगम के अनुसार उन्मनी में प्रवेश होने से ही चरम स्थिति नहीं होती क्योंकि उन्मनी कलाओं के अंतर्गत है । उन्मनीकला भी तो कला ही है । उन्मनी स्थिति को ही त्रिशूल पद से कहा जाता है जिसके ऊपर काशी नित्य प्रकाश रूप में विद्यमान रहती है । इसीलिए अंत में उन्मनी की भी निवृत्ति हो जाती है । यही निष्कल परमपद है । यहाँ कहा जा सकता है कि वर्तमान युग मे श्रीअरविन्द के प्रयोगविज्ञान में 'सुपर- माइण्ड' का जो स्थान है उससे 'ओवरमाइण्ड' का भेद है, इस प्रकार, इसमें भी उन्मना का वैशिष्ट्य है । उन्मना-निवृत्ति हो जाने पर 'शांतं शिवम् अद्वयम्' के अतिरिक्त और कुछ नहीं रहता । अमनस्क का लक्ष्य यही होगा,