भारतकोश
अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

पृष्ठ 33, कुल 128 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 33

[ ३ ] गोरक्षनाथ - (वर्णरत्नाकर) । गोरक्षपा - (सस्क्य विहार की सूची) । नामों के ये रूपान्तर देने के दो प्रयोजन हैं। पहला तो यह कि प्राचीन साधनात्मक और दार्शनिक ग्रन्थों में इन दोनों महासिद्धों का स्मरण यह बतलाता है कि ये दोनों ही अपने समय के बहुत प्रसिद्ध और अतिमान्य महासिद्ध थे और विभिन्न साधन संप्रदायों के ग्रंथ इन्हें आदर के साथ स्मरण करते थे। दूसरी बात यह है कि तन्त्र प्रभावापन्न सभी साधनसंप्रदायों ने इनका नाम अपनी सूची में सम्मिलित कर लिया है, जैसे ये उन्हीं के संप्रदाय के हों। इसी- लिए इनके नामों के इतने रूप मिलते हैं। इनकी प्रसिद्धि काल और देश दोनों ही दृष्टियों से बहुत व्यापक थी। ऊपर के ग्रन्थों में योग, तन्त्र और शैव ग्रन्थ अधिक हैं। इनमें से अधिकांश (जैसे हठ- योगप्रदीपिका १४ वीं शताब्दी के पूर्व, वर्णरत्नाकर १३ वीं-१४ वीं शताब्दी, कौलज्ञाननिर्णय के ग्रन्थ ११ वीं शताब्दी) १४ वीं शताब्दी के पूर्व के हैं। तन्त्रालोक का समय ११ वीं शताब्दी का पूर्व भाग है। अभिनवगुप्त के उल्लेख से इतना पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है कि मत्स्येन्द्रनाथ १० वीं शताब्दी के अन्तिम दशक (९९१ ई०) के पूर्व तक पर्याप्त प्रसिद्ध और पूजित हो चुके थे। जालंधरनाथ राजा देवपाल (८०६-८४६ ई०) के समकालीन थे। इस प्रकार ये तीनों महासिद्ध ९ वीं-१० वीं शताब्दी के पूर्व प्रसिद्ध हो चुके थे। वैसे सिद्धकायावाले महासिद्धों का कालनिर्णय करना सांप्रदायिकों की दृष्टि में उपहासास्पद है। बहुत से आधुनिक दृष्टिवाले नाथ- पंथी गोरक्ष को वाक्यपदीयकार भर्तृहरि का समकालीन मानते हैं। कुछ पौराणिक नाथपंथी गोरक्ष को यदुवंशी श्रीकृष्ण के एक विवाह का साक्षी मानते हैं और कुछ लोगों का विश्वास है कि उन्होंने चारो युगों में अलग-अलग स्थानों में अवतार भी लिये थे। इतना विस्तृत उल्लेख मिलने पर भी गोरक्षनाथ का प्रामाणिक जीवनवृत्त आज भी उपलब्ध नहीं है। उनके जन्मादि के सम्बन्ध में नेपाल में प्रचलित एक कथा के अनुसार महादेव ने एक पुत्र- कांक्षिणी नारी को विभूति दी। नारी ने अविश्वास कर उसे गोबर के ढेर में फेंक दिया। बारह वर्ष बाद महादेव के पुनः अनुसंधान के