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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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[ ६ ] ही कह लेने का अवसर मिल जाय तो उसे पूर्ण लाभ समझा जाय, इसलिए कुछ विद्वानों ने प्रयास किया। डा० हजारीप्रसाद द्विवेदी ने गोरखनाथ को शंकराचार्य के बाद दूसरा महिमाशाली व्यक्तित्व- वाला महापुरुष घोषित किया। बाद में विद्वानों ने तत्कालीन परि- स्थितियों का मूल्यांकन किया और यह स्थिर किया कि जिस समय भारतवर्षीय धर्मसम्प्रदायों में वामाचार, पंचमकार के परम परि- शुद्ध और साधनोन्नतिकारी रूप का दुरुपयोग और कुरूपोपस्थापन होने लगा था और उसे मनुष्य की विगर्हित वासनाओं की पूर्ति का साधन समझा जाने लगा था, उस समय साधना की पवित्रता, चरित्र की परमोच्चता, संयमपूर्ण जीवन की शक्तिमत्ता और आडं- बररहित जीवन की महिमा का उद्घोष गोरखनाथ ने ही किया। वस्तुतः प्राचीन तांत्रिक साधना-परम्परा और उसके अवस्थागत क्रमिक विकास के महत्व को गोरक्षनाथ अच्छी तरह जानते थे। इस- लिए उन्होंने तांत्रिक साधना-गत मूल सिद्धान्तों, जैसे गुरु शिष्यवाद, दीक्षा, परीक्षा, अधिकारभेदवाद की शैव संप्रदायों में पुनः पूर्ण प्रतिष्ठा की क्योंकि उस समय अशैव बौद्धादि सम्प्रदायों में इन नियमों और सिद्धान्तों के उल्लंघन से तांत्रिक साधना का विगर्हित रूप प्रकट हो रहा था। गोरखनाथ की संस्कृत और हिन्दी दोनों प्रकार की रचनाओं से उपर्युक्त नियमों के प्रमाण पुष्कल परिमाण में प्राप्त हो सकते हैं। गोरक्षनाथ ने दूसरा महत्वपूर्ण कार्य शैव सम्प्रदायों का संगठन करके सम्पन्न किया। बौद्धों की दार्शनिक क्षेत्र में पराजय तो कुमारिल और शंकराचार्य प्रमाणित कर चुके थे, लेकिन सांप्रदायिक और सामाजिक क्षेत्र में बौद्धों का अब भी बड़ा प्रभाव था। बौद्ध संन्यासियों का प्रभाव हर्षवर्धन के समय तक कितना था, यह इतिहास स्पष्ट बतलाता है। संन्यासियों में उनकी संख्या सबसे ज्यादा थी। लेकिन शंकराचार्य के बाद भी शैव संन्या- सियों का संगठन न हो पाया था और कालामुख, कापालिक, पाशु- पत, लिंगायत आदि अनेक सम्प्रदाय तत्कालीन बौद्धों की तरह जन-समाज में भय, शंका, घृणा आदि की दृष्टियों से देखे जाते थे। समाज की साधनागत और धर्मगत समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करने की शक्ति इनमें समाप्त हो चली थी। यों कहा जा सकता है कि इनकी सामाजिक उपयोगिता समाप्त हो गयी थी।