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अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

अमनस्क योग (गुरु गोरखनाथ - सहज समाधि, तारक योग एवं मनोलय विज्ञान सटीक)

Amanaska Yoga with Intro by MM Gopinath Kaviraj

गुरु गोरखनाथ (भूमिका: महामहोपाध्याय गोपीनाथ कविराज) द्वारा

DevanagariHindipublished128 पृष्ठ

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अतः ये भी शक्तिहीन होते जा रहे थे। उसी समय काश्मीर शैव दर्शन और साधना का विकास हो रहा था। उसमें कई आचार्यों का अभ्युदय हो चुका था। इन सारी आवश्यकताओं और परिस्थितियों को भली भाँति परख कर गोरक्षनाथ ने सदाचारपरा- यण, संयमपूर्ण परम्परागत शैव दर्शन और साधना पर आधारित और जीर्णप्राय शैव सम्प्रदायों से संगठित सिद्धमत अथवा नाथ- योगी सम्प्रदाय का समारंभ किया। बहुत पहले से ही लकुलीश, पाशुपत, लिंगायत, कालामुख आदि वेदवाह्य घोषित हो चुके थे। शंकराचार्य की शैवता और वेदानुकूलता तो गोरक्षनाथ के पहले से ही घोषित थी। अतः इन तथाकथित वेदवाह्य, जीर्णप्राय शैव सम्प्र- दायों का नये संगठित रूप में पुनरुज्जीवन आवश्यक था ही जो गोरक्षनाथ के हाथ से सम्पन्न हुआ। ये महत्वपूर्ण कार्य सामान्य चरित्रवाले व्यक्ति से सम्पन्न नहीं हो सकते थे। आदर्श के अनुकूल अपने चरित्र को खरा उतार कर धर्मप्राण जनता के सम्मुख प्रस्तुत करनेवाला व्यक्ति इस प्रकार का नेतृत्व सम्हाल सकता है। साधनागत पूर्णता के साथ चरित्रगत- पूर्णता भी आवश्यक थी। सामान्य जनता को आकर्षित कर लेनेवाले आकर्षक चरित्र और पूर्ण व्यक्ति से ही ये कार्य संभव थे। इसका पूरा प्रमाण हमें उपर्युक्त स्रोतों में मिलता है। उनके ग्रंथों को देखने से ज्ञात होता है कि वे संस्कृत के अच्छे संस्कारसम्पन्न ज्ञाता थे। सिद्धसिद्धान्तपद्धति इसका प्रमाण है। इसी प्रकार मत्स्येन्द्रोद्धार के लिए जब गोरक्ष कदली देश गये थे, तो वहाँ की स्त्रियोंने गोरक्ष के रूपको देखकर उन्हें गोरक्ष से मिलने नहीं दिया। इस कथांश के आधार पर लोगोंने यह अनुमान लगाया है कि गोरखनाथ बहुत सुन्दर थे।¹⁷ मत्स्येन्द्रोद्धार के ही प्रसंग में लोककथाओं से पता चलता है कि गोरखनाथ बहुत चतुर, समय देखकर कार्य करनेवाले और विभिन्न प्रकार के वेष धारण करने में बहुत निपुण थे। विभिन्न प्रकार की विद्याओं में निष्णात होने के कारण उन्हें इसमें तनिक भी कठिनाई न होती थी। वे मृदंगवादन में निपुण थे। नृत्यकला का भी ज्ञान था। सूक्ष्म रूप धारण करने की सिद्धि भी थी। लोक- १७. गोरखनाथ और उनका युग—डा० रांगेय राघव, पृ० ४५-४६।